Sabika Mehdi for YuvaAdda.com

ये आर्टिकल हमें यू.के. के शहर बरमिंघम में रहने वाली सबिका मेहदी ने भेजा है, सबिका सेंट्रल यूनिवर्सिटी जामिया मिल्लिया इस्लामिया से ग्रेजुएट हैं. विदेश की चमचमाती सड़कें और वहां की पॉश कॉलोनी के लोग दिल से उन्हें कितने खाली लगे, यही बताया है उन्होंने… दिल से पढ़िएगा।

नया देश, नई ज़ुबान, नया पहनावा, एकदम नया माहौल…. सब कुछ अलग. ओखला की कुछ गंदी, कुछ साफ़ गलियां और उनमें शोर मचाते बच्चे. एक दिन अचानक यूं ही ख़्याल आया, क्या सच में, सच में तीन साल हो गए.

मैं ओखला की मिडिल क्लास लड़की जब इंग्लैंड आई तो मैंने बहुत सारे बदलाव महसूस किए. उनमें से सभी तो नहीं लिख पा रही हूं पर फिर भी एक छोटी सी कोशिश की है उस अकेलेपन को बयां करने की.

न कोई दोस्त,  न रिश्तेदार और न ही पड़ोसियों की ताका-झांकी. ऊपर से हर वक्त घिरे हुए बादल. कुछ वक्त तो ये सब अच्छा लगा पर फिर धीरे-धीरे ये घुटन का सबब बन गया.

मेरी तरह हर इंडियन को बारिश का वो प्यारा सा मौसम पसंद होता ही है. पर अब सब बदल गया है दोस्तो. अब ये घनघोर घटा, काले बादल मुझे बोर करने के अलावा और कुछ नहीं करते. जैसे सर्दी में नमी ख़त्म हो जाती है, वैसे ही यहां के लोग भी रुखे हैं. बाहर से तो बड़े मिलनसार मगर अंदर कोई एहसास बाकी ही नहीं है.

अब बस मुझे कैंपस में होने वाली वही छोटी-छोटी गोसिप, फ्री का एंटरटेनमेंट, कौन लड़की कैसा सूट पहन कर आई जैसी टिपिकल देसी बातें ही मुस्कुराने की वजह देती हैं. जो दोस्ती वाली बात वहां हुआ करती थी वो यहां नहीं दिखती. दोस्तों के लिए किसी से भी भिड़ जाना. पंगे तो हम ऐसे लेते थे कि कोई खानदानी दुश्मनी भी ना निभाए. चाय का कप लेकर कहीं भी मुंडेर या ज़मीन पे ही बैठना बहुत याद आता है. कैंपस के मोमोज़ की खुशबू सोच लेने भर से ही मुह में पानी आ जाता है.

बस… कभी-कभी ज़िंदगी कुछ देर के लिए बीते वक्त के परदे उठा देती है और यहां बेगानों के बीच अपने देश और उन्हीं इरिटेटिंग लोगों की याद आंसू ले आती है. सच कहूं तो वतन,  दोस्त और हर चीज़ की अहमियत उनसे दूर जाकर ही पता चलती है.

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