Anida saifi, YuvaAdda.com

घर और शहर से दूर रहकर काम करना कोई बच्चों का खेल नहीं है. दूर से दिखने वाली आज़ादी सिर्फ़ आज़ादी नहीं होती, साथ में टोकरा भर ज़िम्मेदारियां भी मिलती हैं. बेग़ाने शहर में वो अपनो वाली बात नहीं होती, कि जिससे मन आया तपाक से बतया लिए. यहां किसी से बात करने से पहले हज़ार बार सोचना पड़ता है. पी.जी. में रहने वाली लड़कियों के तजुर्बे को पढ़कर आज़ादी वाले जो भ्रम हैं वो टूट जाएंगे.

फैमिली और ऑफिस के प्रेशर के अलावा ये दूसरे शहर के लोग जीने नहीं देते. फिर वो अकेलापन जिसे डिप्रेशन में तबदील होने में ज़्यादा वक्त नहीं लगता. आख़िर में हम सिर्फ़ सुकून चाहते हैं जो आसानी से नहीं मिलता.

बनारस की रहने वाली वर्षा वर्मा पेशे से सॉफ्टवेयर डेवलपर है. उन्होंने बताया कि दिल्ली जैसे शहर में रहना किसी चुनौती से कम नहीं है. वर्षा को दिल्ली में आए 6 साल हो गए लेकिन अब भी वो किसी को अपना नहीं कह सकती. शादी का प्रेशर तो पूछिए ही मत. बिमारी में अपनों की कमी खलती है उसे बर्दाश्त करना हर किसी के बस का नहीं होता. दवा से बीमार शरीर तो ठीक हो जाता है पर मन का इलाज नहीं हो पाता. फिर ये बेगाने शहर वाले बार-बार याद दिलाते हैं कि हम यहां के नहीं है.

एक और बी.डी.एस. स्टूडेंट साएमा का तजुर्बा कुछ अलग है. उन्हें ये शहर बेरुखा नहीं, बस बिज़ी लगता है. वो कहती हैं किसी ने ठीक ही कहा है ये शहर नहीं महफ़िल है. क्योंकि यहां कोई अपना नहीं है…

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