Isha Fatima, YuvaAdda.com

कैंपस का नाम आते ही मेरे दिल दिमाग़ में वो जगह घर कर जाती है जहां मेरी ज़िदगी के सबसे अच्छे दिन बीते. कैंपस का मतलब सिर्फ़ कॉलेज कतई नहीं है. मेरे लिए तो सेन्ट्रल कैंटीन और यूथ कैफे़ भी उतना ही ख़ास है. यूथ कैफे़ हमारा वो अड्डा हुआ था, जिसपर बैठकर बतयाते हुए ना जाने हमने कितनी क्लासेज़ छोड़ी हैं.

पास आऊट होने के बाद जब पता चला कि यूथ कैफे़ बंद हो गया है तो उतना दुख कॉलेज छोड़ने पर नहीं हुआ था जितना इस कैफे़ को बंद होने पर हुआ. लगा था जैसे कोई हमारे किस्सों, ठहाकों को कोई गठरी में बांध कर ले गया हो. चलिए अब एक क़िस्सा आपको यूथ कैफ़े का भी बताती चलूं.

यूथ कैफे़ मजनू के अड्डे के नाम से मशहूर था, जहां नज़र उठाओ वहीं एक कपल मिल जाया करता था. यह किसी भी ऐंगल से युनिवर्सिटी की हिस्सा लगता ही नहीं था. यहां किसी न किसी की लड़ाई देखने को मिल ही जाती थी. मुझे आज भी वो दिन याद है जब हमारा पूरा ग्रुप लंच के लिए यूथ कैफे़ रवाना हुआ था. दो लड़के अपने-अपने काफ़िले के साथ पहुंचे और जमकर एक-दूसरे पर टूटे पड़े.

उस रोज़ मैनें पहली बार लड़कों को लड़ते हुए देखा था. दोनो पार्टियों ने एक-दूसरे को खबू धोया था.  मुद्दा एक लड़की थी. बेचारी कोने में खड़ी सहम रही थी, और रो-रोकर अपने पार्टनर को छोड़ देने की गुज़ारिश कर रही थीं.  मोहब्बत, दोस्ती, दुश्मनी, मौज-मस्ती हमारे यूथ कैफे़ की रौनक़ थी.

सैंट्रल कैंटीन पर डिप्लोमा वालो का राज़ हुआ करता था. कैंटीन के खाने के बारे में सोचती हूं तो आज भी डर जाती हूं, वो खाना किसी सज़ा से कम नहीं हुआ करता था. मगर अब महसूस होता है, उस सज़ा में भी मज़ा था. समोसे की चटनी लाजवाब थी, मैंने दुबारा कहीं वैसे समोसे नहीं खाए.

अब कभी वहां से गुज़रना होता है तो सारी यादें फिर से ताज़ा हो जाती हैं. दिल एक बार फिर मचल उठता हैं, और भीनी सी मुस्कान के साथ मैं वहां से गुज़र जाती हूं.

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