Sahil Champarani for YuvaAdda.com

मेरा एक जूनियर है जो छोटे भाई की तरह है. अक्सर मेरे रूम पे आते-जाते रहता है. एक दिन अचानक से जब वो आया तो एक अजीब सी ख़्यालों में डूबा नज़र आया.

-‘किसकी ख़्यालों में डूबे हो भाई…’

पूछने पर पहले तो उसने इस सवाल को टालने की कोशिश की. मगर कुछ देर में खुद ही एक लड़की की तारीफ़ करने लगा. लड़की की चाल-ढ़ाल, रंग-रूप, सादगी, हया, अदा और न जाने क्या-क्या?

तारीफ़े सुनकर मेरी भी दिलचस्पी बढ़ी. जब फोटो दिखाया तो सारा माज़रा समझ गया कि मेरा ये हीरो लड़की की आंखों को देखकर ही मदहोश हो गया है. उसकी बड़ी-बड़ी गहरी नील सी आंखों में डूब चुका है. अब उस समंदर से निकलने की कोई सूरत नहीं, कोई रास्ता नहीं.

इसकी महबूबा की ये फोटो देखकर मैं भी किसी के ख्यालों में खो सा गया. और कहते हैं ना कि निगाहों में बात ही ऐसी होती है जिन्हें देखते ही आप अपने-आप में नहीं रह पाते. आप नज़रों के घेरे में क़ैद हो जाते हैं. पहली बार मैं भी 9वीं क्लास में आई एक नई लड़की की नज़रों के सामने मैंने अपना दिल, दिमाग, होश सब कुछ समर्पित कर दिया था और अब भी एक लंबा अरसा गुज़र जाने के बाद भी उसने मुझसे मुझको छीना हुआ है.

तभी ध्यान आया ये चेहरा भी कहीं देखा हुआ है. –‘अरे! ये तो हमारी सीनियर है बे…’

जवाब में उसने शायराना अंदाज़ में कहा –

‘भाई आप ना जान पाओगे कि इश्क़ क्या चीज़ है,

ये धन, दौलत, मज़हब, दीन -धर्म, उम्र नहीं देखती…

‘वॉव, चलो अच्छा है! तुम्हारा प्यार तुमको मिले या न मिले पर एक बात तो सामने आई कि अब तुम एक अच्छे शायर ज़रूर बन सकते हो. लेकिन मैं तुम्हें सीनियर से जूता खाने से नहीं बचाउंगा…’

‘भाई आप भी ना अच्छा मज़ाक कर लेते हैं…’ –उसने मेरी बात काटते हुए कहा और अब हमारी बातचीत शुरू हुई.

‘अच्छा तो तुम प्रपोज़ क्यूँ नहीं कर देते…?’

‘भाई! जब भी मैं उसके पास जाता हूँ तो दिल की धड़कनें तेज़ हो जाती हैं. बहुत कुछ कहना रहता है पर कुछ कह ही नहीं पाता और इधर आजकल तो उसे वो मुझसे नज़रे चुराने लगी है. उसे आभास हो चुका है कि मैं उसके इश्क़ में गिर चूका हूँ. अब आप ही बताईए मैं क्या करूँ…?’

‘यार अब मुझे भी कुछ आईडिया नहीं है, मैंने भी किसी लड़की को अब तक प्रपोज़ नहीं किया है.’

‘भाई आप भी क्या झूठ बोलते हैं’ –थोड़ा अचंभित होते हुए मेरी तरफ़ देखते हुए उसने कहा…

‘चलो एक काम कर सकता हूं, मैं उस लड़की से बात करता हूँ… लेकिन उसके तुम्हें कितने सैंडिल पड़ेंगे इसमें मैं कुछ नहीं कर सकता.’

‘रहने दीजिए भाई… भले ही वक़्त लगे, लेकिन मैं ही उसे अपने हाल-ए-दिल को सुनाऊंगा’ –मेरे कॉन्फिडेंस और दिलासा भरे शब्दों पे पानी फेरते हुए उसने कहा…

मैंने भी आगे कुछ नहीं बोला क्योंकि इश्क़ ऐसी चीज़ है जिसमें किसी का मश्विरा काम नहीं करता.

तभी वह मेरी शेर-व-शायरी वाली डायरी को लेकर पढ़ना शुरू किया और पढ़ते-पढ़ते ‘साड़ी’ वाली कविता के पास जा पहुंचा और उसकी जमकर तारीफ़े करते हुए उस लड़की से सुनाने की बात करने लगा…

‘बाबू हिम्मत जुटाकर पहले प्रपोज़ कर लो, उसके बाद कुछ सुनाना वगैरह और रही बात ‘साड़ी’ वाली कविता की तो यह तो फुल फ्लर्टिंग शायरी है, सुनाओगे तो चप्पल ही खाओगे’ – मैंने उसे समझाया.

पर वो कहाँ मानने वाला, कहने लगा कि –‘भाई जो भी हो पर ये वाली कविता तो मैं ज़रूर सुनाऊंगा उसे…’

और अपने कॉपी पर कविता उतारकर वह निकल लिया.

अभी दो दिनों पहले उस लड़के का कॉल आया था. बोल रहा था कि वो मजनू  हो गया है. उस लड़की ने कुछ दिनों से कॉलेज जाना  छोड़ दिया है. इसी वजह से वह भी कॉलेज नहीं जा पा रहा है. उसने एक बार पूरी हिम्मत जुटाकर लड़की को प्रपोज़ कर दिया था, लेकिन उसी के बाद से लड़की का कॉलेज आना जाना बंद कर दिया है.  अब भगवान जाने क्या माज़रा है… अब मेरा भी कोर्स ख़त्म हो चुका है तो कैम्पस जाना भी बंद है. ऐसे में मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता….

‘लेकिन इतना तो तय है कि भाई कुछ-कुछ नहीं बहुत कुछ हो रहा है…’

 

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