Sahil Champarani for YuvaAdda.com

“यार, ये हिटलर ही है ना, देख… देख… भाई कैसे तेल निकल रहा है इस हिटलर का…”

“यार ये मैडम हैं अपनी, कुछ तो इज़्ज़त करना सीख”-सुनीत ने विनीत को समझाते हुए कहा और अपनी बाईक रोक दी.

“ये… ये क्या कर रहा है भाई… बाईक क्यों रोक दी..?”

“देख भाई मैम है वो अपनी, मदद करना तो बनता है”-सुनीत ने आगे मैडम की बढ़ते हुए कहा.

“मदद तो मैं भी कर ही दूं मैडम का, इतनी सोणी मैडम कटरीना से कम लागै हैं के. पर कि करैं हिटलर, हिटलर ही होवे हैं, ये जब भी चलावे हैं तो तोप ही चलावे हैं, प्यार से कभी फूल ना बरसावे हैं” -विनीत ने तुरंत सुनीत को अपने हरियाणवी अंदाज़ में समझाने की कोशिश की, विनीत बिहार से है जबकि सुनीत  हरियाणा से.

ये दोनों के संगत का ही असर है कि विनीत थोड़ा-बहुत हरियाणवी सीख गया और सुनीत थोड़ी-बहुत भोजपुरी…

खैर, आश्रम के लम्बे जाम में मैडम स्वाति की स्कूटी ख़राब हो गई थी जिसे धक्के मार-मार कर वह मैकेनिक के पास ले जा रही थी. परेशानी साफ़-साफ़ चेहरे से झलक रही थी. कड़ाके की ठंड में भी माथे पर पसीना आ चुका था और कुछ ज़ुल्फ छटक-छटक कर रूख्सार पर आकर उनकी परेशानियों को और बढ़ा रहे थे, जिसे कम करने के लिए वो बार-बार उन्हें सम्भाल रही थी लेकिन वो अपनी झुमकों को कैसे संभाल पाती?

बड़ी-बड़ी नशीली आंखें किसी मददगार को इधर-उधर तलाश रहीं थी. भारतीय पारंपरिक ड्रेस साड़ी में बिल्कुल क़यामत लग रही थी. आने-जाने वालों की नज़रें इस खूबसूरत भंवर में ज़रूर उलझ जाती, पर यह दिल्ली है साहेब. मदद को कौन आगे आए?

कहा जाता है कि दिल्ली दिल वालों का है पर यहां दिल्लगी की ज़रा सी भी फुर्सत नहीं मिलती… दिल्ली दिल वालों की नहीं,भागदौड़ करने वालों की है…

“मैम, आईए मैं आपकी मदद कर दूं” -सुनीत को अपने पास देख स्वाति मैम की आंखें खुशी से चमक उठीं.

अब यहां आश्रम के जाम और ख़राब स्कूटी ने स्टूडेंट और मैडम से परे एक नए सिरे से बात शुरू करा दी. एक अलग नई पहचान बनने लगी.

सुनीत ने विनीत को एकबारगी बताया था कि उसने हिटलर के सामने खुद को सरेंडर कर दिया है.

कबाब में कहीं हड्डी ना बन जाए यह सोचकर विनीत तुरंत ही बाईक से कॉलेज निकल लिया.

सुनीत और मैडम स्वाति स्कूटी ठीक कराकर एक ही स्कूटी पर हंसते-मुस्कुराते, बातचीत करते हुए जब कॉलेज पहुंचे, तो देखने वालों की आंखें फटी की फटी रह गईं. हिन्दी वाले प्रोफेसर की रोमांस भरी कविताएं क्षण भर में ही गमगीन हो गई. क़तार में लगे सभी फौजों को लग गया कि अब वे अपनी जंग हार चुके हैं.

ये हिटलर बहुत मासूम हिटलर थी और अगर लड़कियां हिटलर की तरह अपने नाज़ व नखरे ना दिखाएं तो उनका हुस्न क्या उनकी अदा क्या.

नए साल में कॉलेज में बहस करने का पहला नया टॉपिक मिल गया.

और इसी शुभ अवसर पर कॉलेज में पार्टी का आयोजन था.

विनीत ध्यान से सुनित और मिस स्वाति को देख रहा था. हिटलर मर चुका था. सुमित मंच पर खड़ा अपनी शायरियां सुना रहा था दोनों निगाहें आपस में कुछ बातें कर रही थी…

तुम्हें देखकर कोई क्यों ना भूल जाए अपना सबकुछ

तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है…”

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