मैंने सच में देखा है

सपनों को टूटते हुए

अपनों को छूटते हुए

तन्हाई से लड़ते हुए

मैंने सच में देखा है

तुफ़ानों में बहते हुए

खामोशी से सहते हुए

हर लम्हें से लड़ते हुए

मैंने सच में देखा है

सूनी पड़ी आंखों में

हाथों की लकीरों में

भूके पेट में

बिलकती चीखों में

मैंने सच में देखा है

मंदिरों-मस्जिदों के

मांगते हुए लोगों में

ख़त्म हुई आस में

वोटों के खिलवाड़ में

मैंने सच में देखा है

लुटती फसलों में

मरते किसानों में

सैलाबों की तबाही में

बहते मकानों में

बढ़ते विकास में

आशा की दीवार में   

मैंने सच में देखा है…

Isha Fatima, YuvaAdda.com

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