By Afroz Alam Sahil

आप रोज़ अपने जान पहचान वाले लोगों से और यहाँ तक के कुछ अंजान लोगों से भी मिलते होंगे, लेकिन इनसे कभी नहीं मिले होंगे. ना ही ऐसी कोई कहानी सुनी होगी, असल ज़िन्दगी में तो बिल्कुल नहीं

आईए आज इनसे भी रूबरू हो जाइये. इनका नाम अशोक कुमार मंशारमी है. मैं जैसे ही मुनिरका से इनके ऑटो में सवार हुआ,  कुछ ही मिनटों में इन्होंने एक गाना गुनगुनाना शुरू कर दिया. धीरेधीरे उनकी आवाज़ बढ़ती गई. अब वो फुल वॉल्यूम में थे… —‘रोज़ आती हो तुम ख्यालों में, ज़िन्दगी में भी मेरी जाओयूँ ही तुम मुझ से बात करती हो या कोई प्यार का इरादा है…’

इनके गाने का लुत्फ़ लेते हुए मैंने इनकी वीडियो भी बनानी शुर कर दी, जिसे वो आसानी से समझ गए, लेकिन वो शरमाए नहीं, बल्कि उसी वॉल्यूम में गाते रहें. मुझे हैरत थी कि कितने प्यार से और दिल की गहराई से उनकी आवाज़ निकल रही थी. गाने के बाद की बातचीत काफी दिलचस्प और मेरे दिलों को झकझोरने वाली थी.

मंशारमी बताते हैं कि वो सिंधी हैं. उनके दादादादी आज़ादी के समय पाकिस्तान से भारत चले आए थे. बातचीत में उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि पाकिस्तान वालों को कुवैत ने बैन कर दिया, अब कहीं अमेरिका भी कर दे.

वो आगे बताते हैं कि उनका परिवार यूपी में रहता था. लेकिन वो पिछले 36 साल से अपने दोस्त अब्दुल वहीद के साथ रह रहे हैं. अब्दुल वहीद ने शादी कर ली, उसके बाल बच्चे हो गए, लेकिन वहीद ने मुझे नहीं छोड़ा.

लेकिन अब मेरी शादी की बारी आई. मुझे एक लड़की पसंद थी. बहुत मुहब्बत करता था उससेलेकिन उसके घर वालों ने कहा कि मेरी बेटी शादी के बाद किसी मुसलमान के घर नहीं रहेगी. इतना बोलकर वो खामोश हो गए

मैंने उत्सुकतावश कहाफिर आगे क्या हुआ? उनका जवाब थाहोना क्या था. मैंने मना कर दिया. एक लड़की के लिए अपनी दोस्ती थोड़े ही ख़त्म कर लेता. हालांकि वहीद ने मुझे काफी समझाया, लेकिन मैंने उसकी ये बात नहीं मानी.

आज 62 साल का हो चुका हूं. वहीद की वीबी भी ये दुनिया छोड़कर जा चुकी है. अब वहीद के बच्चे ही मेरे बच्चे हैं, मैं ही उन्हें सुबहसुबह तैयार करता हूं और उन्हें स्कूल पहुंचाता हूं.

इतने में हमारी मंज़िल जाती है. लेकिन मेरा दिल कर रहा था कि उनसे खूब सारी बात की जाए, लेकिन उन्होंने कहा कि प्लीज़ मेरे ज़ख्म कुरेदो मत, बल्कि एक दिन मेरे साथ बैठकर चीरफाड़ करो. तुम्हें मैं अपने दोस्त वहीद से भी मिलवाउंगा. बच्चों से भी मिलवाउंगा. उन्हें भी अच्छा लगेगा

अब तो बस मुझे उस दिन का इंतज़ार है जब मैं पूरे दिन की छुट्टी लेकर उनके साथ वक़्त गुजारूं और और उनकी पूरी ज़िन्दगी से रूबरू हो जाऊंकाश वो दिन जल्द ही जाए

आप इनके गाने को यहां सुन सकते हैं

(ये कहानी अफ़रोज़ आलम साहिल के फेसबुक टाईमलाईन से ली गई है.)

1 COMMENT

LEAVE A REPLY