Nishat Hashmi for YuvaAdda.com

कैसे कहूँ तुमसे, मैं तुम्हारी फेयरी टेल्स का कोई प्रिंस तो हूं नहीं. वो ख्वाबों की दुनिया जो तुम सजाकर आई थी, मुझे तो उससे कोई वास्ता नहीं. यारी-दोस्ती, मस्ती-मज़ाक मेरी तो अपनी ही एक दुनिया है अलग, जहां बस मैं हूँ, मेरा अपना कोई नहीं.

यह भी एक सच है कि घर चलाने का जो एक बहुत बड़ा ज़िम्मा मेरे सर है. जो तुम समझती नहीं कभी. वही मेरे चिड़चिड़ेपन की वजह है. मैं सोचता रहा ज़िन्दगी भर कि तुम्हारी सब ज़रूरतें पूरी तो कर रहा हूँ और क्या चाहिए तुम्हें. पर शायद 5 स्टार होटल में लंच की जगह एक निवाला अपने हाथ से खिला देती तुम्हारी ख़ुशी तुमसे ही न संभलती. शायद मैं जेवरात की जगह एक प्यार भरा हाथ तुम्हारे हाथ में दे देता तो तुम खिल उठती. सारी ज़िन्दगी हम लड़ रहे थे, एक दुसरे से ज्यादा खुद से…

अब मैं 45 का हूँ और तन्हा खड़ा हूँ. न दोस्त हैं न रिश्तेदार. और न ही अब पार्टी में जाना अच्छा लगता है. बच्चे भी आते ही तुम्हें ही पूछते हैं, तो मुझे याद आता है वो दिन जब मैं ऑफिस से आते ही अपने लैपटॉप पर बिजी हो जाता था और अब ऐसा लगता है कि जैसे किस्मत मेरा ही दिया मुझे लौटा रही है. अब मन करता है तुम मेरे साथ खाना खाओ. पर कैसे कहूँ तुमसे कि मेरा इंतज़ार कर लिया करो.

अब याद आता है जब तुम मेरा खाने पर इंतज़ार किया करती थी और मैं बाहर से ही खाना खाकर आया करता था. रिश्तेदार तुम्हारी खैरियत लेते हैं. सही भी लगता है कि मैं कहाँ कहीं जाया करता था. शादी-बियाह या किसी की मय्यत में तुम ही मुझे ज़बरदस्ती लेकर जाती थी.

अब मैं बेड पर अकेला बैठा सोचता हूँ कि तुम किस तरह मेरा ख्याल करती थी. मेरी इतनी सेवा करती थी. तुम यह सब कैसे करती थी. कैसे कहूँ तुमसे कि मैं कितना शर्मिंदा हूँ और तुमसे बहुत कुछ कहना चाहता हूँ लेकिन कह नहीं पाया.

कैसे कहूँ कि एक छोटी सी बात कहने में मैंने कितना वक़्त लगा दिया. कैसे कहूँ कि मैं तुम्हारे बिना कुछ नहीं…

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