Fatima Farheen for YuvaAdda.com

हाल ही मुझे जानीमानी फिमिनिस्ट कमला भसीन के एक सेमिनार में शामिल होने का मौक़ा मिलाकमला भसीन ने लेक्चर में जो बातें कहीं उसको शामिल करते हुए मैं अपनी बात आगे करूंगी. 

जेंडर शब्द को समाज ने मिलकर परिभाषित किया है, जो लड़केलड़की की परिभाषा है. जो हमारी बायोलॉजिकल परिभाषा है. हालांकि सच तो ये है कि हर औरतमर्द के जिस्म में सिर्फ़ चार से पांच प्रतिशत का ही फ़र्क़ है, 95 प्रतिशत दोनों का जिस्म एक जैसा ही है. दोनों के पास दो आँखें, दो कान, दो टांगें, दो हाथ, दो पैर, फेफड़े, दिल, दिमाग, नाक है. जो चीज़ें फ़र्क़ की हैं वो ये है कि औरतें अपने जिस्म में बच्चा रखके पैदा कर सकती है और अपने जिस्म से ही ब्रेस्टफीड करके उसे साल दो साल तक पाल सकती है. और बेचारे मर्दों के साथ मुझे हमदर्दी है कि आपको क़ुदरत ने ऐसे डिफेक्टिवघटिया जिस्म दिया है कि तो आपके पास यूट्रस है और न ही आप बच्चे को ब्रेस्टफीड करके उसे पाल सकते हैं. ये अलग बात है कि ब्रेस्ट के दो छोटेछोटे निशान बना रखे हैं, लेकिन वो किसी काम के नहीं हैं. एक बूंद दूध निकल के नहीं आता और छप्पन इंच की छाती लिए घूमते हैं.”

सेमिनार अटेंड करने के दो दिन के बाद ही मैं जामिया हाईजेनिक से एमसीआरसी की तरफ़ रही थी. मेरे पीछे हाईजेनिक से ही सात आठ लड़कों का झुण्ड आपस में हंसीमज़ाक करते हुए चल रहा था. उनके आपस के मज़ाक में मुझे कब शामिल कर लिया गया मुझे पता नहीं चला. शायद उस वक़्त उन्हें फ़र्ज़ी दूध के निशानों वाली छप्पन इंच की छाती की याद गई होगी और वो अपनी मर्दानगी को याद कर बैठे होंगे.

कुछ ही पल में वो मुझपे भद्दे व गंदे कमेंट कसने शुरू कर दिए. मुझे उन पर गुस्से के साथसाथ बहुत अफ़सोस हो रहा था कि काश मैं इन्हें भी वो बात बता पाती जो दो दिन पहले कमला भसीन द्वारा मैंने सुना था.

मैं उन पर गुस्सा निकाल पाती कि मेरी छाती का दूध तुम्हारे मज़ाक का पात्र नहीं. मुझे इस पर फ़ख्र है. मुझे ये रात दिन एहसास दिलाता है कि मैं तुमसे बेहतर हूँ. मेरे भारी भरकम कमर पर मुझे शर्म नहीं, क्यूंकि मुझे ये एहसास है कि मेरी माँ के पास भी ये भारी भरकम कमर है और जब मैं पेट में रही होउंगी तो वो अपनी कमर के सहारे चल फिर कर अपनी जिम्मेदारियां निभाती होंगी. वो जिम्मेदारियां जो तुमने हर औरत पर अपनी पित्रसत्तात्मक सोच के साथ थोपी है.

कमला भसीन का ये वाक्य सुनकर मुझे बहुत हैरानी हुई थी जब उन्होंने ये कहा था किसत्तर से अधिक उम्र हो जाने के बावजूद आज भी जब मै घर अकेले जाने में घबराती हूँ. घबराती हूँ कि कोई पीछे अपनी पित्रसत्तात्मक सोच के साथ तो नहीं चल रहा. लेकिन दो दिन बाद ही जब इस घटना से रूबरू होना पड़ा तो ये समझ में गया था कि जब तक लड़की होना हम अपनी कमजोरी समझेंगे वो हमारी कमजोरी ही रहेगी. जब से हम उसे अपनी ताक़त समझ लेंगे तो सभी परेशानियों से हम लड़ सकते हैं.

मैंसी ताक़त के साथ उन लड़कों के सामने गई और कहातुम जैसे मर्दों की वजह से लड़कियों को घर में उनके माँबाप क़ैद कर देते हैं. और दूसरों के माँबाप की कौन कहे, तुमने खुद अपनी माँबहनों को भी अपने जैसे लोगों से बचाने के लिए क़ैद कर दिया होगाऔर फिर मैं वहां से चली गई और वो मुझे बहुत देर तक देखते रहे

LEAVE A REPLY