मीरान हैदर

कल से मेरे ज़ेहन में ये बात घूम रही है कि ओखला विधायक और अबुल फ़ज़ल वार्ड के काउंसलर ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 15 जून को जो इफ्तार पार्टी रखी है, वो कितना जायज़ है और कितना नाजायज़…

कल से लेकर आज तक कुछ साथियों का फेसबुक पर पोस्ट पढ़ने को मिला, जिसमें हमारे साथियों का कहना है कि जिस तरह से हमने आरएसएस की इफ्तार और इन्द्रेश कुमार का विरोध किया है, उसी तरह से आम आदमी पार्टी की इफ्तार पार्टी का भी विरोध होना चाहिए.

बताते चलें कि 5 जून को आरएसएस की मुस्लिम राष्ट्रीय मंच ने जामिया स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में अपना  इफ्तार पार्टी का आयोजन किया था, जिसमें बतौर चीफ़-गेस्ट इन्द्रेश कुमार को बुलाया गया था. जामिया के छात्रों ने इस इफ्तार पार्टी के खिलाफ़ कड़ा विरोध-प्रदर्शन किया था, जिसमें पुलिस ने बल का प्रयोग करते हुए लाठी चार्ज तक कर दिया था.

विरोध करने की मुख्य वजह इन्द्रेश कुमार पर लगे 4 बम धमाकों (मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस, मक्का मस्जिद, अजमेर दरगाह) के आरोप और आरएसएस की साम्प्रदायिक और दंगाई राजनीति थी.

ऐसे में सवाल उठता है कि आम आदमी पार्टी की इफ्तार में चीफ़-गेस्ट दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की तुलना आरएसएस और इन्द्रेश कुमार से करना कितना जायज़ है?

क्या अरविन्द केजरीवाल ने कभी ऐसा काम किया या स्टेटमेंट दिया, जिससे समाज की शान्ति व्यस्था ख़राब हुई हो?

क्या अरविन्द केजरीवाल पर इन्द्रेश कुमार के तरह किसी आतंकी गतिविधि में शामिल होने का आरोप है?

इन सबका जवाब “ना” में है.

तो ऐसे में सवाल उठता है कि फिर किन कारणों से हम जामिया कैंपस में आम आदमी पार्टी की इफ्तार का विरोध करे.

जामिया एक ऐसी यूनिवर्सिटी है, जिसमें पिछले कुछ सालों से किसी न किसी मौक़े पर राजनीति से जुड़े नेताओं का आना-जाना लगा हुआ है. चाहे वह कांग्रेस के सलमान खुर्शीद हो, बीजेपी के नेता व मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावेडकर या फिर किसी तीसरे चौथे पार्टी के नेता. लेकिन विरोध किसी का नहीं हुआ.

लेकिन अगर एक यूनिवर्सिटी के छात्र होने के नाते मैं अपनी बात कहुं तो ज़्यादा बेहतर होगा.

बताते चलें कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया में 2005 के बाद छात्र-संघ का चुनाव नहीं हुआ है. छात्र नेताओं ने जब कभी भी वाईस चांसलर से अपने मुद्दों को उठाने व उनका हल करने के लिए छात्र-संघ के चुनाव की मांग की तब तब यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने ये कहकर मना कर दिया की ‘छात्र संघ की बहाली होने से यूनिवर्सिटी में पॉलिटिक्स शुरू हो जायेगी.’

जब कि हक़ीक़त ये है कि पिछले 10 सालों से यूनिवर्सिटी कैंपस लगातार एक के बाद एक राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है.

चाहे पिछले वाईस चांसलर नजीब जंग की बात हो या फिलहाल के वाईस चांसलर तलत अहमद हो, इन दोनों पर ही यूनिवर्सिटी कैंपस को अपने ज़ाती फ़ायदा के लिए इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहते हैं.

कभी किसी पार्टी के मुशायरा के लिए यूनिवर्सिटी को किराए पर दिया जाता है तो कभी किसी नेता की बर्थ-डे मनाने के लिए तो कभी किसी पार्टी की इफ्तार आयोजन के लिए.

पिछले बार जब आरएसएस की इफ्तार पार्टी पर छात्रों ने कड़ी आपत्ति जताई थी, तब यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन ने ये वादा किया था की अब जामिया कैंपस में किसी भी राजनीतिक पार्टी का प्रोग्राम करने की इजाज़त नहीं मिलेगी.

अब ऐसे में सवाल उठना तय है कि जिस यूनिवर्सिटी में पिछले 12 सालों से छात्र-संघ के चुनाव नहीं हुए हैं. जिस यूनिवर्सिटी के ऑडिटोरियम में हमेशा किसी न किसी पॉलिटिकल पार्टी का प्रोग्राम होते नज़र आता है. क्या वो यूनिवर्सिटी और उसके वाईस चांसलर अब इस बात के लिए राजी होंगे कि आने वाले सेशन से छात्र संघ की चुनाव बहाल किये जाएं, ताकि छात्रों को अपने मुद्दों को उठाने व उनका हल कराने का पूरा हक़ मिल सके. या फिर हमेशा के तरह यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन अपने अड़ियल रुख पर क़ायम रहेगी?

और आख़िर में जाते-जाते एक सवाल की यूनिवर्सिटी कैंपस पर पहला हक़ छात्रों का होता है, लेकिन जो ऑडिटोरियम या क्लासरूम छात्रों को अपना ही लेक्चर या सेमिनार कराने के लिए नहीं दिए जाते, उस जगह को बाहर के लोगों या राजनीतिक पार्टियों को क्यों और किसके इशारे पर दिए जाते हैं? इन सब पर बहस होनी चाहिए और इनका तयशुदा वक़्त रहते जवाब भी मिलना चाहिए…

(मीरान हैदर आम आदमी पार्टी के यूथ विंग के नेता व जामिया मिल्लिया इस्लामिया में रिसर्च स्कॉलर हैं.)

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