Afshan Khan, YuvaAdda.com

देश बदल रहा है. और इस बदलते माहौल में देशभक्ति का ठेका उन लोगों के हाथ में जो अंग्रेज़ों के दलाल थे. मुल्क के गद्दार थे. जिनका आज़ादी की लड़ाई में कोई योगदान नहीं था. जो हमारे वीरजवानों के पीठ में छूरा घोंपने का काम कर रहे थे

लेकिन अब यही लोग कह रहे हैं कि वन्दे मातरम कहो नहीं तो गद्दार क़रार दिए जाओगेअरे अंग्रेज़ों के दलालो, देश के गद्दरोंजो अशफ़ाकुल्लाह ख़ान वन्दे मातरम कहता हुआ फांसी का फंदाझूल गया. जो वीर हमीद वन्दे मातरम कहते हुए पाकिस्तान को नस्तनाबूद कर दियाउस अशफ़ाक़ व हमीद की क़ौम को चाहे कुछ कहो, लेकिन गद्दार तो न कहो

दोस्तों, आरएसएस का पूरा इतिहास उठाकर पढ़ लो. इनके गद्दारी के अनेकों दास्तान इतिहास के पन्नों पर आपको मिल जाएंगे. लेकिन देशभक्ति का सबसे ज़्यादा दम भरने का अभिनय यही लोग कर रहेहैं

दरअसल, ये अपने गुंडागर्दी पर देशभक्ति की चादर ओढ़ा कर अपनी राजनीतिक रोटी सेंक कर देश के गंगाजमुनी तहज़ीब को हमेशा के लिए ख़त्म कर देना चाहते हैं. अंग्रेज़ों के ये दलाल उन्हीं अंग्रेज़ों कीनीति —‘फूट डालो राज करोको अपना कर इस आज़ाद मुल्क को अपना ग़ुलाम बनाना चाहते हैं

सच पूछे तो इनकी ये देशभक्ति मुल्क के आम अवाम की भावनाओं के साथ खेलने और उन्हें बेवकूफ बनाने के लिए एक बेहतरीन हथियार है.

_88331182_88331181

बहरहाल, मैं इन गद्दारों के इतिहास पर अधिक बात नहीं करूंगी. फिलहाल बात अपने विषय पर ही होगी. तो ये वन्दे मातरम के नाम पर विवाद कोई नई बात नहीं है. ‘हिंदुस्तान में अगर रहना है, तो वन्देमातरम कहना होगाआरएसएस का पुराना नारा है. ये अलग बात है कि इनके बाप दादाओं ने खुद कभी वन्दे मातरम नहीं कहा है

यहां आपको बताती चलूं कि दरअसल, बंकिम चंद्र चटर्जी द्वारा लिखा गया येवन्दे मातरमगीत, सिर्फ़ बंगाल की राष्ट्रभक्ति पर फोकस है और ये उस वक़्त के माहौल को दर्शाता है. इस गीत में जिनप्रतीकों और दृश्यों का ज़िक्र है, वे सब बंगाल की धरती से ही ताल्लुक़ रखते हैं. प्रसिद्ध बांग्ला लेखक नरेस चंद्र सेनगुप्ता इस गीत के बारे में स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि बंकिम बांग्ला राष्ट्रवाद से इतने ग्रस्तथे कि उन्हें भारतीयराष्ट्रवाद की परवाह नहीं थी. और बंकिम की देशभक्ति को समझने के लिए इनका लिका आनंद मठ पढ़ लेना काफ़ी होगा. आप देख सकते हैं कि कैसे इन्होंने अंग्रेज़ों की वाहवाहीलिखी है

ये चटर्जी साहब वहीं हैं, जिन्हें अंग्रेज़ों ने 1858 में डिप्टी कलेक्टर के पद पर नियुक्त किया और फिर इन्हीं अंग्रेज़ों ने इन्हेंराय बहादुरऔरसी.आई..’ जैसी उपाधियों से सम्मानित भी किया.   

शुरू में देश के लिए लड़ने वालों को इस गीत पर कोई आपत्ति नहीं थी. लेकिन 1937 में वन्दे मातरम पर उपजे विवाद को सुलझाने के लिए एक समिति बनाई गई. इसमें गाँधी, नेहरू, अबुल कलामआज़ाद और सुभाषचन्द्र बोस जैसे लोग शामिल थे.

इस समिति की बैठक में एक बात ख़ास तौर पर उभर कर सामने आया कि यह गीत एक धर्मविशेष के हिसाब से भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है. यह आपत्ति सिर्फ़ मुसलमानों ने ही नहीं, बल्किसिक्ख, जैन, ईसाई और बौद्ध संगठनों ने भी दर्ज कराया

इस समिति ने इसके हल के रूप में यह तय किया कि इस गाने के शुरू के सिर्फ़ 2 अंतरे गाए जा सकते हैं, क्योंकि इन दो अंतरों में कोई धार्मिक पहलू नहीं है. लेकिन इस समय भी आरएसएस/हिन्दूमहासभा दोनों का ही यह कहना था कि भारत एक हिन्दू राष्ट्र है और यह पूरा गीत गाना चाहिए. तब इस मसले का कोई हल नहीं निकला, क्योंकि ये दोनों संगठन किसी भी बात को सुनने को तैयार नहींहुए.  

सच पूछे तो इस विवाद को हवा देने वाले लोग ये बात भूल गए हैं कि राष्ट्रगान, जन गण मन है ना कि वन्दे मातरमवही राष्ट्रगान जिसके पढ़ते ही हर भारतीय का दिल गर्व से धड़कने लगता है. इसे दिलसे पढ़ने पर इंसान भावुक भी हो जाता है. लेकिन आज जन गण मन से ज़्यादा महत्व वन्दे मातरम को क्यों दिया जा रहा है? जबकि हमारा राष्ट्रगान तो देश की तारीफ़ों और उसके महान होने का जज़्बाजगाता है

समझने वाली बात ये है कि देश को मज़बूती तब मिलती है जब इसका पूरा समाज एकजुट होकर इकट्ठा खड़ा रहता है. एकता का प्रतीक बना रहता है. जब तक ये अंग्रेजों वाली नीति को अलविदा कहकरहमारे भारतीयों में एकता और एकजुटता क़ायम नहीं होगी तब तक ये सारे विवाद देश की तरक़्क़ी में बाधा बने रहेंगे. ये बहुत खेद की बात है कि हम देश की आज़ादी की 71वीं सालगिरह मनाने जा रहे हैंऔर आज भी वन्दे मातरम वाले विवाद में ही अटके हुए हैं

ज़रूरी नहीं है कि हम हर बात को सरकार की ज़िम्मेदारी समझ कर थोप दें या निंदा करते रहें, जिस दिन सारे हिन्दुतानी ये ठान लें कि आपस में एक दूसरे के प्रति भाईचारे का पालन करेंगे और हम सबएक हैं, उस दिन कोई भी दल या नेता आपस में लड़वाने का काम नहीं कर सकेगा, क्योंकि ये देश प्रत्येक नागरिक का है.

LEAVE A REPLY