Afshan Khan, YuvaAdda.com

मुझे याद है कि मीडिया में एक दौर आया था स्टिंग ऑपरेशन का. तब शायद देश के ज़्यादातर नेताओं ने आवाज़ उठाई थी कि ये हमारेनिजता के अधिकारका हनन है.

आप सबको गुलेल डॉट कॉम की वो रिपोर्ट तो ज़रूर याद होगी कि जिसमें एक स्टिंग ऑपरेशन के ज़रिए खुलासा किया गया था कि अगस्त 2009 में गुजरात राज्य में एक महिला की राज्य सरकार द्वारा ज़बर्दस्त निगरानी करवाई जा रही थी. इस पर गुजरात सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया यह आई कि ऐसा उसके पिता के अनुरोध पर उसकी सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया गया था. इस रिपोर्ट के महीने भर ही इसी वेबसाइट ने कुछ और ऑडियो टेप जारी कर ये साबित किया कि इस निगरानी का मक़सद उस महिला को सुरक्षा प्रदान करना नहीं, बल्कि एकसाहबके लिए लड़की की रोमांटिक ज़िन्दगी के बारे में जानकारी जुटाना था.

तब की केन्द्र सरकार ने गुजरात सरकार द्वारा एक महिला की कथित जासूसी की हक़ीक़त सामने लाने के लिए एक जांच आयोग के गठन का फैसला किया था.

मुझे ये भी याद है तब केन्द्र सरकार ने साफ़ तौर पर कहा कि ये किसी केनिजता के अधिकारका हनन है. इस नाकामयाब क़दम पर भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने तब काफी बवाल काटा था.

खैर, इसे भी फिलहाल छोड़ देते हैं. आप सबको नीरा राडिया टेप का मामला तो ज़रूर याद होगा. आपको याद हो या हो मुझे तो अच्छे से याद है कि इस विवाद के बाद केंद्र सरकार ने ‘निजता की रक्षाके लिए क़ानून बनाने की बात की थी. इस मामले में अदालत ने पहली बार माना था कि फोन टैपिंग निजता में घुसपैठ है. साथ ही अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा था कि निजता का अधिकार संविधान के अनुच्छेद —21 के तहत दिए गए जीवन एवं व्यक्तिगत आज़ादी के अधिकार तथा इंटरनेशनल कोवनेंट ऑन सिविल एण्ड पॉलिटिकल राइट्स की धारा —17 के अंतर्गत सुरक्षित है.

अब क़ानूनी बातों को भी दरकिनार करते हैं. भारतीय परंपरा की बात करते हैं. तो मैं बताती चलूं कि भारतीय परंपरा में निजता का हमेशा सम्मान किया गया है. धर्म की रक्षा करना राजा की नैतिक ज़िम्मेदारी थी और इसी के तहत उसे नागरिकों की निजता की भी रक्षा करनी होती थी. कौटिल्य ने अपनेअर्थशास्त्रमें राष्ट्रीय सुरक्षा के खतरे की समस्या पर विचार करते हुए जासूस नियुक्त करने का सुझाव तो दिया परंतु जासूसों को छुपकर किसी बात सुनने का अधिकार नहीं दिया. इसके बजाए उसने शासकीय जासूसों को सलाह दी कि वे जोड़े बनाकर लोगों की भीड़ में घुस जाएं और वहां राज्य के मसलों पर बहस छेड़ दें.

छोड़िए, इन बातों को भी. अब आते हैं अपने असल मामले पर. और ये मामला है किआधारके बहाने सरकार अपने हर नागरिकों की पलपल की जो निगरानी करने जा रही है, क्या वो निजता के अधिकार का हनन नहीं है. क्या यह पूरी प्रक्रियानिजता के अधिकारोंका अतिक्रमण नहीं है. इसका जवाब चाहे जो भी हो, लेकिन केन्द्र सरकार इसे हनन नहीं मानती. उसका स्पष्ट तौर पर कहना है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार ही नहीं है.

ऐसे में सवाल उठता है कि कहां गई वो दलील जो नेता अपनी पार्टी से जुड़े किसी मीडिया के स्टिंग ऑपरेश पर कहते थे. कहां गई केन्द्र सरकार की वो दलील जो उन्होंनेसाहेबपर आए स्टिंग ऑपरेशन पर कही थी. कहां गया केन्द्र सरकार कानिजता की रक्षाके लिए क़ानून बनाने का वो वादा जो उसने नीरा राडिया के टेप सामने आने के बाद किया था. या फिर कहां गए वो लोग जो बातबात परभारतीय परंपराकी दुहाई देते हैं. क्या आम नागरिकों कीनिजताउनकी अपनी निजी ज़िन्दगी नहीं है. क्या नागरिकों की निजता की रक्षा केन्द्र सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है. या फिर केन्द्र में पार्टी बदल जाने से सरकार का दायित्व बदल जाता है.

दिलचस्प तो यह है कि आश्चर्यजनक रूप से ख़ुद अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी सोमवार को पोर्न पर प्रतिबन्ध के मामले में चल रही बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कह चुके हैं किसरकार मॉरल पुलिस नहीं बन सकती और हर घर में तांकझांक नहीं कर सकती’. तो फिर आधार के बहाने जो तांकझांक करने की कोशिश की जा रही है, उसका क्या?

फिलहाल उम्मीद अब सुप्रीम कोर्ट से है. शुक्र है कि न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय खंडपीठ ने केन्द्र सरकार इस दलील को स्वीकार करने से इनकार कर दिया है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है

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