Faizyab Khan for YuvaAdda

महेश घर में घुसते ही, प्रिया! ‘आज की गोष्ठी बहुत सफ़ल रही, मेरी कविता के सामने सबकी कविताएं फ़्लाॅप हो गई.’

प्रिया तो वैसे भी चोट के कारण ग़ुस्से में भरी बैठी थी. बस फिर क्या था? तो क्या करूं! ‘यहां घर का काम करते-करते हालत ख़राब हो जाती है और तुम ड्यूटी से घर आने की बजाए गोष्ठियां निपटाते फिरते हो और अब साढ़े ग्यारह बजे घर आ रहे हो. जहां सारे आदमी पांच बजे ड्यूटी से घर आ जाते है वहीं तुम! बस क्या कहूं’

और तुमने तो दरवाज़ा खुलते वक़्त यह भी नहीं पूछा कि तुम लंगड़ा क्यों चल रही हो. ये सब तो तुम्हें कभी दिखेगा नहीं. बस गोष्ठियां निपटाते फिरो…

प्रिया की बातें सुनकर महेश के अच्छे मूड को जैसे  दीमक ने खा लिया हो. महेश एक अजीब निगाह से प्रिया की तरफ़ देखकर ‘तुम अब शुरु न हो और ये बताओ कि बनाया क्या है. भूख लगी है.’

प्रिया फिर से हल्की तेज़ आवाज़ में ‘क्यों खाकर नहीं आए. गोष्ठियों में खाना नहीं होता और मिला क्या होगा वही दो से तीन सौ रुपये, क्योंकि तुमलोग ख़ादिम जो ठहरे हिन्दी-उर्दू के.’

महेश प्रिया का यह तंज सुनकर दबी आवाज़ में कह ही देता है कि ‘खाना दोगी या नहीं?

प्रिया मुंह दूसरी तरफ़ कर ‘जाओ लौकी की सब्ज़ी और दाल रखी है, निकाल कर खा लो. साईड में सलाद और रायता भी है.’

महेश खाना निकाल कर लाता है और अपने हाथ से एक कौर उठाकर प्रिया की तरफ़ मुख़ातिब होकर ‘लो खाओ और इसके साथ सोनू को भी खिलाता है, लेकिन प्रिया बस एक ही कौर खा पाती है सोनू उससे कुछ ज़्यादा और महेश को मुख़ातिब कर ‘मैंने काफ़ी देर इंतेज़ार किया और जब  इन्तेज़ार करती-करती थक गई तो फिर भूख बर्दाश्त न हो सकी. फिर सोनू के भी बहुत भूख लगी थी और चोट की दवा भी तो खानी थी.’

प्रिया की बात ख़त्म ही हुई थी कि सोनू एक आद कौर खाकर मां के पास लेटकर मोबाइल में गेम खेलने लगता है. महेश खाना रखकर कमरे में आता ही है कि प्रिया एक बार फिर से दबी आवाज़ मे प्यार के साथ ‘ऐसा है खाना खा चुके हो तो अब लाईट बन्द कर दो. लाइट बंद करके भी टहल सकते हो.’

महेश लाईट बंद करके लेट कर ‘बताओ कहां दर्द हो रहा है. लाओ दबा दे.

प्रिया थोड़ा झल्लाकर ‘अब जब सब काम हो गया तब मेरा दर्द याद आया. छोड़ो मेरे दर्द को…

लेकिन महेश ज़िद करने लगा है और उसकी ज़िद के आगे वह बता ही देती है कि ‘कुछ नहीं बस सीधे पैर का पंजा मुड़ गया था, जिससे चलने में काफ़ी तकलीफ़ हो रही है.’

महेश उठ कर प्रिया का पंजा दबाता है और सोनू इस दरमियान वीडियो गेम खेलने में ही व्यस्त होता है कि तभी प्रिया सोनू से गुस्से में आकर ‘सो जा रात बहुत हो गई है तो सोनू दबी आवाज़ में ‘कल तो संडे है माँ’ और वह माँ के सिधियाने से पैतियाने आकर गेम खेलने मसरूफ़ हो जाता है.

पंजा दबाते-दबाते महेश प्रिया से ‘कुछ दर्द कम हुआ कि नहीं’ प्रिया ‘थोड़ा बहुत, महेश’ अच्छा रुको अब कम होगा. तब महेश उठकर रैक की तरफ़ जाता है और ट्यूब ढूंढता है, लेकिन उसे वह नहीं मिलता तब वह प्रिया से पूछता है कि ‘अरे दर्द का ट्यूब कहाँ रखा है.’

प्रिया ‘सही से देखो रैक की साइड में रखा है.’ अंधेरे में वह ढूंढ तो ट्यूब रहा होता है, लेकिन उसके मन में ‘परसों सोनू की फ़ीस भी तो जमा करनी है और महीना पूरा होने वाला है. गाँव के घर का बिजली का बिल भी तो जमा करना है और अम्मा को भी रुपये भेजने हैं. साथ में घर के फ़्रिज की किस्त के साथ राशन के भी रुपये प्रिया को देने हैं.’

इसी बीच प्रिया की आवाज़ उसके कानों में पहुंचती है कि ‘अरे मिला नहीं ट्यूब अभी तक.’

मिल गया. महेश ट्यूब निकालकर लगाता है, लेकिन उसके मन में उसके घर के खर्चो का ही ख़्याल है. इसी बीच प्रिया महेश को घर के खर्चों के बारे में ‘याद है न अबकी कितने खर्चे हैं. हालांकि तुम चाहो तो कुछ बचत हो सकती. तुम्हारे गांव वाले घर में सब रहते और कमाते भी हैं तो बिजली का बिल तुम्ही क्यों देते हो. अम्मा को भेज दो रुपये, बल्कि अगर अम्मा आना चाहे तो वह यही आकर रहें और बिजली का बिल तुम सिर्फ़ इसलिए ही देते हो, क्योंकि बिजली का कनेक्शन तुमने करवाया है. जैसे बिजली में रहकर वह तुम्हारे ही ऊपर ऐहसान कर रहे हो.’

महेश प्रिया की बातें सुन तो रहा था, लेकिन मन में ‘कैसे होगा इतनी जल्दी, सैलेरी कम और ख़र्चे ज़्यादा, चलो देखते हैं कुछ, जिसने अब तक इंतेज़ाम करवाया वही अब भी करवाएगा. सरकारी बाबूगीरी के बस नाम ही बड़े है.’

प्रिया का सवाल महेश की ख़ुमारी तोड़ देता है. ‘इतनी देर से ट्यूब लगा रहे हो, लेकिन दर्द में तो कुछ फ़र्क़ पड़ा नहीं, प्रिया का यह कहना था कि महेश का पारा चढ़ जाता है.’

तुम्हारे साथ तो कुछ करना ही बेकार है. कुछ कमी न निकालो तो काम कैसे चले? प्रिया नाक सिकोड़ कर ‘हम्म, हम झूठ बोल रहे है न?

माँ-बाप की बहस देखकर सोनू का ध्यान गेम से हट जाता है और वह वीडियो गेम की रोशनी मे जब ट्यूब को देखता है तो पिता से दबी आवाज़ में ‘पापा इस ट्यूब पर ओडोमास लिखा है ये तो मच्छरों वाला ट्यूब है’ सोनूे का ये कहना और कमरे मे एक सन्नाटा सा छा जाता.

2 COMMENTS

  1. बहुत ही बढ़िया कहानी! मज़ा आया बस एक सुझाव है कि इसका शीर्षक ” दर्द गया नहीं ” होना चाहिए था odomos से सारा सस्पेंस खुल गया
    मज़ेदार कहानी है

LEAVE A REPLY