Akanksha Bhatnagar for YuvaAdda

इस भाग दौड़ की ज़िन्दगी में मेरे अपने सपने कहां खो गए, पता ही नहीं चला. रोज़ सुबह से शाम तक की ड्यूटी निभाते-निभाते हर रोज़ सबको खुश करते-करते कभी-कभार थक जाती हूं. सोच में पड़ जाती हूं कि मेरे कभी खुद के भी सपने होते थे, जिनको पूरा करना मैं भी चाहती थी.

आसमान में उड़ान भरना किसको अच्छा नहीं लगता. बिना किसी शर्त के, बिना किसी के डर के, बस मैं और मेरे सपने.

आज भी मैं उसी सफ़र पर हूं, जहां से मुझे अपने सपने को पूरा करना है. मानो जैसे कल ही बात हो. बच्चों को स्कूल से पढ़ाकर हम सब टीचर निकल ही रहे थे कि अचानक मैं और मेरे साथी एक अनजाने सफ़र की ओर चल पड़े.

रास्ता शांत था और हम सब जैसे बच्चों की बातों में उनके बचपन की शरारतों की चर्चा कर रहे थे, कि अचानक मेरी नज़र दो छोटी फूल के समान लड़कियों पर पड़ी जो एक दुकान के बाहर खड़ी थी और खाना बना रही थीं. मेरे क़दम अपने आप रूक गए.

दोनों की उम्र दस साल से ज्यादा नहीं थीं. पर वो अपनी उम्र से बड़ा काम कर रही थी. उनके हाथों में जादू था. जैसे मानो चांद की आकार की गोल रोटी उस छः साल लड़की ने तवे पर डाल दी.

उन दोनों को देखकर मेरी आंखों में नमी आ गई. मैं सोच में पड़ गई कि जो उम्र उनकी खेलकूद की है, पढ़-लिख कर कुछ बन जाने की है, वो बिना कुछ सोचे समझे अपने काम मे व्यस्त थी.

हम आगे निकल गए, जहां से उनका घर नज़दीक था और मेरा सफ़र शुरू हुआ था. दिन बीते और आज हम फिर उसी रास्ते से गुज़र रहे थे. वो दुकान के पास जाते-जाते मेरे क़दम धीरे-धीरे होने लगते. देखा तो उस दिन के मुताबिक़ आज कोई नहीं था.
उस छोटी लड़की ने मेरी आंखों में देखा. जैसे उसकी आंखें मुझसे कुछ कह रही हो. मुझसे रहा नहीं गया. मैं जा पहुंची उन दोनों की आंखों की चमक को देखकर. मैं न चाहते हुए भी ऑर्डर किया और आज मुझे मौक़ा मिला उन दोनों से बात करने का.

मैंने पूछा स्कूल नहीं जाती? जवाब आया नहीं… फिर बड़ी ने भी यही जवाब दिया. मैं कुछ और पूछ पाती कि आवाज़ आई आपका ऑर्डर तैयार है दीदी. देखा तो दुकान पर और लोग आ रहे हैं और सुनाई दिया छोटी हाथ जल्दी चला नहीं तो पैसे नहीं आएंगे. और वो छोटी सी लड़की बिना सोचे समझे काम में लग गई.

मैं घर की तरफ़ निकल रही थी. कान में एक आवाज़ गूंज रही थी —छोटी हाथ जल्दी चला… उन शब्दों में कुछ था. जैसे मानों उनका कोई अधूरा सपना पूरा हो गया हो. और उनकी खुशी में मेरा पूरा…

2 COMMENTS

  1. इस आर्टिकल को पढ़ कर ऐसा लगा जैसे किसी और ने मेरे मन की बात कह दी हो| बस फर्क सिर्फ इतना सा है कि मैंने अपने अहसासों को इस तरह से कागज़ पर नहीं उतारा था| बहुत अच्छा लगा|

LEAVE A REPLY