Mohd. Aasif for Yuva Adda

इस भाग-दौड़ भरी ज़िन्दगी में हर मोड़ हमें कई नए लोग मिलते हैं. कुछ दिखावा करने वाले होते हैं तो कुछ सादगी-पसंद…

ज़्यादातर हमने देखा है कि ये सादगी-पसंद लोग दिखने में बहुत ही मामूली लगते हैं, लेकिन शायद आपको पता नहीं उनकी इसी सादगी में एक बहुत बड़ा किरदार छुपा हुआ मिल जाएगा.

ऐसा ही एक किरदार अक़ील-उर-रहमान साहब का है. खिजाब किए हुए लाल बाल, दमकता हुआ चेहरा, हमेशा एक मुस्कान लिए हुए 58 साल के अक़ील-उर-रहमान सुबह 8 बजे से रात 8 बजे तक अपनी छोटी से कैंटीन और बड़े दिल के साथ छात्रों और अध्यापकों की सेवा में लगे रहते हैं.

और जब उनके ग्राहक चाय नाश्ता करके कप और डिस्पोजेबल प्लेट्स खाने की जगह पर या झाड़ियों में भूल जाते हैं, तब अक़ील साहब अपने हाथ में एक लोहे की छड़ और एक खाली डिब्बा लेकर आस-पास के बगीचों में निकल पड़ते हैं. अपने साथ काम करने वाले शहज़ाद को साथ लेकर वो जब निकलते हैं तो मंज़र देखने वाला होता है. उनका ये सफ़ाई अभियान 2008 से जारी है.

अक़ील साहब एक संपन्न व्यक्ति हैं फिर भी वो रोज़ दिन में तीन-चार बार अपनी कैंटीन के आस-पास के बागीचों में खुद कूड़ा उठाते हैं. एक दिन हमने उनसे इस बारे में बातचीत की.

जब हमने उनसे पूछा कि, कैन्टीन के आस-पास की सफ़ाई करने का ज़िम्मा तो जामिया प्रशासन का है, तो फिर आप ये सफ़ाई अभियान किस लिए करते हैं?

उनका कहना था, “जामिया सिर्फ़ प्रशासन का नहीं है, हमारा भी है. इसलिए इसे साफ़ रखना हमारी भी ज़िम्मेदारी बनती है.”

फिर वो आगे कहते हैं, यूनिवर्सिटी में विदेशों से भी मेहमान आते हैं तो हमें उन पर पड़ने वाले इम्प्रेशन यानी छाप का भी ध्यान रखना होता है. अगर हमारी कैंटीन के आस-पास गन्दगी होगी तो हमारे नाम के साथ साथ जामिया का भी नाम ख़राब होगा और यह हमारे लिए तकलीफ़ देने वाली बात होगी.

बताते चलें कि जामिया के गेट न. 8 से दाखिल होने इतिहास विभाग के क़रीब ‘हाइजेनिक’ नामक एक कैन्टिन चलाते हैं. ‘हाइजेनिक’ एक ऐसी जगह है, जहां आप अपनी च्यास (चाय की प्यास) को शांत कर सकते हैं. अपनी भूख-प्यास मिटा सकते हैं. और ख़ास बात ये है कि इस ‘हाइजेनिक’ के आस-पास लगभग 5 लॉन हैं, जहां आप आराम से  बैठकर चाय-नाश्ता कर सकते हैं.

अक़ील साहब गुर्दे में पथरी और पैरों में एक्जीमा होने के बावजूद खुद से इन पांचों लॉन के सफ़ाई का ज़िम्मा उठाते हैं. वे न सिर्फ़ इंसानों का ख़्याल रखते हैं, बल्कि रोज़ाना सुबह आकर हिंदी विभाग से सटे हुए बगीचे में कबूतरों को दाना भी डालते हैं. इसलिए वे छुट्टियों के दिन भी आते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि इन्सान तो फिर भी उनकी ग़ैर-मौजूदगी में अपना ख़्याल रख सकता है, लेकिन ये बेज़ुबान पंछी उनकी राह तकते रहते हैं.

जामिया से उनके ताल्लुक़ात पर के बारे में पूछने पर वो बताते हैं कि, जामिया से उनका बहुत पुराना रिश्ता है और इसीलिए लगाव भी बहुत गहरा है.

वे बताते हैं, मैंने अपनी स्कूली तालीम जामिया के स्कूल से हासिल की. मेरे अब्बा जामिया में एक क्लर्क की हैसियत से काम करते थे. मैंने जामिया से ही ग्रेजुएशन की पढ़ाई भी की, लेकिन घर के हालात की वजह से विदेश जाकर नौकरी करनी पड़ी और तीसरे साल के पेपर नहीं दे सका था. अब मेरे 2 बच्चे, एक लड़का और एक लड़की, दोनों ही जामिया से अपनी तालीम हासिल कर रहे हैं.

अक़ील साहब ने विदेश में ओबेरॉय होटल में वेटर की हैसियत से नौकरी शुरू की, पर जल्द ही उन्हें कैटरिंग सुपरवाईजर बना दिया गया. सन 1980 से 1988 तक 8 साल विदेश में काम करके वे वापस अपने वतन लौट आएं. यहां लौटकर फिर से जामिया को ही अपनी रोज़ी-रोटी के ठिकाने के तौर पर चुना और फ़ोटो-स्टेट के छोटी सी दुकान से शुरू करके उन्होंने सेंट्रल कैंटीन और फिर हाइजेनिक तक अपना सफ़र तय किया.

हमारे एक सवाल पर हल्का सा मुस्करा कर वो कहते हैं, जब तक मैं जिंदा हूं, तब तक मेरी यही ख्वाहिश है कि मैं जामिया के छात्रों-शिक्षकों और जामिया आने-जाने वाले सभी लोगों की सेवा करता रहूं. अब तो जामिया से लगाव का आलम यह है कि घर जाने का ही मन नहीं करता.

ख़ास बात यह है कि अक़ील साहब अपने संस्कार अपने साथ काम करने वाले लड़कों में भी पैदा कर रहे हैं.

शहज़ाद से जब हमने पूछा कि वो इस सफ़ाई में साथ क्यों देता है, तो वो बोलता है, आदमी को साफ़-सुथरा रहना चाहिए और जिस जगह वो रहता है, उसे भी साफ़ रखना चाहिए.

मेरे आख़िरी सवाल का जवाब देते हुए अक़ील साहब कहते हैं, मैं समझता हूं कि स्टूडेंट्स को भी समझना चाहिए कि अगर वे जामिया के हैं और जामिया उनका है, तो हर जगह उन्हें कूड़ेदान इस्तेमाल करना चाहिए और कैंपस को साफ़-सुथरा रखना चाहिए.

अकेला चना क्या भाड़ फोड़ेगा? अक्सर यह सवाल हमारे ज़हन में उस वक़्त कुलांचे मारता है, जब हम अपने सामने किसी ऐसी परेशानी को देखते हैं जिसको पैदा करने वाला पूरा का पूरा समाज होता है. इसी सवाल की पैदाइश हमारे पीछे हटते क़दमों का सबब होती है. पर कुछ लोग ऐसी भी होते हैं जो अपने ज़ेहन में इस तरह के सवालों को पनपने ही नहीं देते हैं और अपने फ़र्ज़ को सामने रखकर उस पर अमल करते हैं. जैसा कि जामिया अक़ील साहब कर रहे हैं.

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