By Afroz Alam Sahil 

पिछले कई दिनों से सोच रहा था की जामिया और जामिया में चल रहे आन्दोलन को लेकर कुछ लिखूं. लेकिन मसरूफ़ियत के बंद कमरों की घुटन में यह काम नहीं हो पा रहा था. पर आज मैंने ठान लिया है कि लिखूंगा और दिल खोलकर लिखूंगा…

जामिया से मेरा रिश्ता सात जनम का तो नहीं, लेकिन सात साल का ज़रूर है. जामिया की तालीम ने ही मेरे ख्यालों को रौशन किया है. यहां की आबो-हवा में ही मेरे जज्बे ने मज़बूती पाई है. मैं जो हूं उसके लिए जामिया का शुक्रगुज़ार हूं और हमेशा रहूंगा. जामिया ने ही मुझे जीने का मक़सद और इंसाफ़ के लिए लड़ने का हौसला दिया है. जिन सिद्धांतो और मूल्यों पर जामिया की बुनियाद है, मैं भी उन्हीं पर खड़ा हूं. हालांकि जामिया के सफ़र में मुझ पर कई इल्ज़ाम लगें… जामिया को बदनाम करने का बदनुमा दाग़ भी मेरे पाक दामन पर लगाया गया. लेकिन मैं एक बार फिर दोहराता हूं कि मैंने ऐसा कुछ भी नहीं किया और न करूंगा जिससे जामिया पर कोई धब्बा लगे.

सच पूछे तो 97 साल के अपने इस लंबे सफ़र में जामिया ने हवाओं के गर्म थपेड़ों का बखूबी सामना किया है. हर उस तूफ़ान से लड़ा है, जिसकी रवानी ने उसे कुचलने का मंसूबा बनाया. लेकिन आज जामिया के छात्र जामिया के आन्दोलन के इतिहास से ही नावाक़िफ़ हैं. यहां के छात्रों ने ख़ामोश रहना ही अपने ज़िन्दगी का मक़सद बना लिया है. यहां आप ये मत सोच लीजिएगा कि जो बोल रहे हैं, वो कोई दूध के धुले हुए हैं. सबके अपने-अपने मक़सद हैं. और उनके मक़सद में जामिया से ज़्यादा उनका वो संगठन है, जिससे वो खुद जुड़े हुए हैं. लेकिन हां, कुछ देर के लिए इतना तो कहा ही जा सकता है कि बोल तो रहे हैं, चाहे मक़सद जो भी हो…

मुझे याद है कि मैं जामिया में एम.फिल का छात्र था. पहली बार जामिया से रूबरू होने का मौक़ा मिला. क्योंकि ग्रुजेएशन में अपने विभाग का सचिव बनकर ही पूरा समय काट दिया. और मास्टर्स में एमसीआरसी ने जामिया के बारे में सोचने का मौक़ा ही नहीं दिया. एम.फिल में नजीब जंग के ज़माने में मैंने जंग करने की ठानी. सबसे पहले क़रीब 500 से अधिक छात्रों से अलग-अलग मुलाक़ात करके उनकी समस्याओं को समझा. फिर जामिया वाईस चांसलर को पत्र के माध्यम से छात्र संघ की बात की. मेरे पहले ही पत्र से जामिया में खलबली मच गई. मुझे प्रॉक्टर ऑफिस बुलाया गया, काफ़ी अच्छी-अच्छी बातें की गई, और इस मुद्दे पर ख़ामोश रहने को कहा गया. लेकिन ख़ामोश रहना मेरे खून में कभी रहा नहीं. इसके बाद दूसरा पत्र भी लिख डाला. और फिर पत्रों का सिलसिला सा चल पड़ा. और हर पत्र को मीडिया ने काफी प्रमुखता से छापा…

अब मेरे पीछे मेरी ‘हिफ़ाज़त’ के लिए गार्ड्स लगा दिए गए. मैं किनसे मिलता हूं. किनसे बात करता हूं, हर चीज़ की जानकारी रखी जाने लगी. और जिस छात्र या शिक्षक से मैंने मुलाक़ात कर ली. अगले ही पल उससे इंक्वायरी शुरू हो जाती थी. इसी दौरान हमने कुछ साथियों के साथ मिलकर ‘फ़ॉरम फ़ॉर स्टूडेन्ट डेमोक्रेसी’ का गठन किया. लेकिन इसकी मीटिंग जामिया के बजाए जेएनयू में करनी पड़ती थी. फिर हमने जामिया प्रशासन के भ्रष्टाचार की पोल खोलने के लिए आरटीआई की मुहिम शुरू की. लेकिन इस मुहिम में मेरे अलावा कोई भी मेरे साथ नहीं था. आरटीआई की मुहिम शुरू करते ही सारे छात्र नेता पता नहीं, कहीं दूर चले गए. क्योंकि उनका मक़सद सिर्फ़ नेतागिरी करना था, उन्हें जामिया में फैले भ्रष्टाचार से कोई मतलब नहीं था. बल्कि उनके सपने ये थे कि कैसे यूनियन की बहाली हो और हम भी अपने नेतागिरी की आड़ में घपले-घोटाले करने शुरू कर दें.

नजीब जंग से जंग करना इतना आसान भी नहीं था. मुझे ये सोचकर ही हंसी आती है कि अगर आज मेरे नजीब अब्बा होते तो ‘भूख हड़ताल’ पर बैठे छात्र पता नहीं, कहां गायब कर दिए गए होते. ऐसा नहीं है कि आज जो नेतागिरी कर रहे हैं, वो उस दौर में नहीं थे. वो थे, लेकिन उनमें नेतागिरी करने का ख़्याल तक नहीं आया. जो एलुमनाई आज जामिया में भाषणबाज़ी कर रहे हैं, वो उस समय ख़ामोश थे. उनका कहीं अता-पता नहीं था.

बहरहाल, अपनी जंग को आगे बढ़ाते हुए मैंने क़ानून का सहारा लिया. जामिया को अदालत की ओर से नोटिस दिया गया. लेकिन जामिया ने कोर्ट को गुमराह किया और मेरे वकील साहब ने मेरा पीआईएल वापस ले लिया. इस बीच मेरी लड़ाई भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी जारी थी. यानी मैं दूसरे मोर्चे पर भी लड़ रहा था. मेरी एक बड़ी लड़ाई बटला हाऊस एनकाउंटर के नाम पर जमा किए गए फंड्स को लेकर थी. तब फंड्स को लेकर मैंने जामिया को ये पत्र भी लिखा कि अब मैं जामिया से अलग से होकर इस लड़ाई को लड़ना चाहता हूं, मेरे फेलोशिप के पैसे जो जामिया ने रोक रखे हैं, वो भी मैं जामिया को दान करना चाहता हूं. इस बीच एनडीटीवी पर एक डिबेट के बाद इस लड़ाई को दबाने के लिए मुझे 50 लाख का लीगल नोटिस भेजा गया, लेकिन जब जामिया को लगा कि मैं क़ानूनी तौर पर काफ़ी मज़बूत हूं और किसी भी क़ीमत पर डरने वाला नहीं हूं तो फिर जामिया के कुछ ‘दलाल’ टीचरों को मेरे पीछे लगाया गया. पता नहीं, कितने लोगों से सिफ़ारिश की गई. अंततः यूनिवर्सिटी के साथ मेरी मीटिंग हुई. और इस मीटिंग में मैंने स्पष्ट कर दिया था कि वाईस चांसलर साहब कितने में बिकेंगे, इसका मुझे अंदाज़ा नहीं, लेकिन जहां जामिया की बदनामी की बात है तो मेरा जामिया अनमोल है, बिकने वाला नहीं… 50 लाख की रक़म को बढ़ाकर कम से कम 10 करोड़ किया जाए… फिर कुछ और बातें हुई. आख़िरकार वाईस चांसलर के दिल में जो बात थी, उसे उन्होंने बोला और मुझे वो सारी आरटीआई वापस लेने को कहा गया. मैंने वापस लिया, ये सोचकर कि मुझ जैसे जामिया में सैकड़ों ‘छात्र’ हैं. अब वो इसे फाईल करेंगे. लेकिन मैं ग़लत था. सब नेता थे, किसी को भी जामिया से कोई मतलब नहीं था और न आज है. फिर अदालत का दरवाज़ा हमीदूर रहमान ने खटखटाया. उसके बदले उसके साथ क्या हुआ, ये जामिया के छात्र नेता बखूबी जानते हैं.

वर्तमान दौर के भी कई छात्र नेता हमारे सम्पर्क में ज़रूर रहे हैं. लेकिन वो ज़्यादा बड़े नेता हैं. उनका जामिया या जामिया के छात्रों की भलाई से सीधा कोई वास्ता नहीं है. फिर भी मैं अपने छोटे भाईयों को सलाह दूंगा कि इस मामले में ज़्यादा हड़बड़ी न करें. सोच समझकर फैसला करें. उन नेताओं को जामिया से दूर रखें, जिन्हें जामिया से कोई मतलब नहीं है. ख़ासतौर पर जामिया प्रशासन से बात करते हुए ये ध्यान रखें कि कहीं वो आपको बेवकूफ़ तो नहीं बना रही है. यक़ीनन मामला अदालत में है, लेकिन अदालत की ओर से छात्र संघ की बहाली पर कोई रोक नहीं लगाई गई है. और जब रोक लगी ही नहीं है तो अदालत की अवामानना कैसे हो जाएगी, ये क़ानून के जानकार ज़्यादा बेहतर बता पाएंगे. साथ ही यह भी कहना चाहूंगा कि जामिया अगर खुद अदालत में जाकर इस केस को ख़त्म नहीं करवाती है, तो कोई भी एक छात्र नेता आसानी से अदालत जा सकता है. उसे अलग से कुछ नहीं करना है, बस इसी मामले में एक आवेदन देकर पार्टी बनना है. मुझे यह भी यक़ीन है कि हमीदूर रहमान भी इस लड़ाई में आपके साथ है. उसकी जहां ज़रूरत होगी, वो आपके साथ खड़ा होगा. लेकिन आप ज़रा ये पता लगाईए कि वो 9 छात्र कौन हैं, जिनसे जामिया ने छात्र संघ चुनाव न कराने के लिए इंटरविन करवाया है.

मेरी नज़र में जामिया मिल्लिया इस्लामिया सिर्फ़ एक शैक्षिक संस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक भी है. यह उन सरफिरों का दयार है जिनकी मेहनत ने अविभाजित भारत को गरमाहट और उर्जा प्रदान की और अपने खून से सींच कर जामिया की पथरीली ज़मीन को हमवार किया. जामिया के दरो-दीवार आज भी उनकी यादों को संजोए हुए हैं और उज्जवल भविष्य के लिए खेमाज़न होने वाले उन दीवानों को जिन्होंने अपने मुक़द्दर को जामिया के लिए समर्पित कर दिया, ढूंढ रहे हैं. भाईचारा, मुहब्बत, इंसानियत दोस्ती के उन मतवालों के सामने देश की एकता एवं विकास सर्वोपरि था, ताकि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक के साथ-साथ राजनीतिक स्तर पर समाज को जागरूक किया जा सके.

जामिया से बाहर के लोगों को भी ये याद रहे इस जामिया का इतिहास ही आंदोलन का रहा है. जिस जामिया ने आज़ादी की लड़ाई में अपना ज़बरदस्त किरदार अदा किया हो. जिस जामिया ने इस देश को ज़ाकिर हुसैन जैसा न जाने कितने लीडर दिए हों, आज वहीं के छात्रों को राजनीति से दूर किया जा रहा है. आज अगर इन्हें राजनीति के ए. बी. सी. डी. से परिचित नहीं कराया जाएगा तो कल इस देश का राजनीतिज्ञ कौन होगा? हमारा देश कहां जाएगा.

आज जब हम सबको यह जामिया विरासत में मिली है तो हम सब अपने फर्ज़ से पीछे क्यों हट रहे हैं… क्या आपका और हमारा यह फर्ज़ नहीं है कि जब आज हमारी जामिया और हमारे भविष्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है, तो हम भी कुछ बोलें. क्या ऐसे समय में हमें खामोश होकर बैठ जाना चाहिए…?

(ये पोस्ट अफ़रोज़ आलम साहिल के फेसबुक टाईमलाईन से ली गई है.)

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