Afshan Khan, YuvaAdda.com

राष्ट्रीय शिक्षा दिवस आने ही वाला है तो सोचा कि क्यों न ज़रा सा शिक्षा की हालत को लेकर भी कुछ चर्चा हो जाए.

आपको बता दूं कि 11 नवंबर हमारे देश मेंराष्ट्रीय शिक्षा दिवसके रूप में मनाया जाता है, जो कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की जन्मतिथि भी है.

मौलाना आज़ाद हमारे स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री थे. मौलाना आज़ाद चाहते थे कि किसी भी राजनीतिक नीति से ज़्यादा ज़रूरी है शिक्षा की नीति को तैयार करना. उनके लिए इस फ़ील्ड में लोकतांत्रिक सिस्टम की अत्यधिक ज़रूरी थी.

अगर आप उनकी शिक्षा की नीति को पढ़ेंगे तो साफ़ हो जाएगा कि अगर आज वो ज़िंदा होते तो देश में शिक्षा का स्तर इतना नहीं गिरा होता. आज छोटे छोटे स्कूलों एयर बड़े से बड़े स्कूलों की हालत ऐसी न होती जैसी आज है.

उनका मानना था कि पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा को एक आम बात कर देना चाहिए. मतलब ये कि हर बच्चा बिना किसी भेदभाव के चाहे वो जाति के आधार पर हो, धर्म के आधार पर या किसी वांशिक कारण से शिक्षा से दूर नहीं रहना चाहिए.

इसके बाद हाई शिक्षा पर ध्यान देना ज़रूरी है और फिर विश्वविद्यालय के स्तर पर ताकि विद्यार्थियों की प्रतिभा उभर कर बाहर आये. आउर वो अपने साथ साथ दूसरों का भविष्य भी उज्ज्वल कर सकें.

उनका ये भी मानना था कि अगर सरकार शिक्षा का काम संजीदगी से नहीं सोचती है तो यह ख़तरनाक है. अपने सरल स्वभाव और नर्म मिज़ाजी के लिए जाने जाने वाले मौलाना आज़ाद आख़िरी सांस तक शिक्षा के समर्थन में बोले और इसको सबके लिए एक हक़ बताकर बयान किया.

शायद आपको पता होगा कि गांधीजी ने हमेशा रोज़गार आधारित शिक्षा की बात की थी. यानी शिक्षा ऐसी हो जिसके बाद एक इंसान अपनी रोज़ीरोटी का भी जुगाड़ कर सके, क्योंकि इसके बिना तो शिक्षा का मूल्य बेमानी रह जाएगा.

अगर आपने गौर किया होगा तो आज हर दूसरा  नौजवान बड़ीबड़ी डिग्रियां लेकर घूम रहा है और नौकरी न मिलने के कारण परेशान है. अच्छे से अच्छे प्रतिभाशील नौजवान और महिलायें इस धक्केमुक्के में रोज़ नौकरी की तलाश में निकल कर थक हार के बैठ जाते हैं. न किसानों का भला हो रहा है और न ही पीएचडी कर चुके स्टूडेंट्स का. देश की लाइब्रेरियों में भी किताबें धूल ही कहा रही हैं क्योंकि जितना विकास सोशल मीडिया का हुआ है उतना किसी भी शैक्षिक संस्थान का नही हुआ है.

डिग्रीधारी शिक्षित बेरोज़गारी का आलम ये है कि एक इंजीनियर किसी छोटेमोटे ढाबे में वेटर की नौकरी करने को मजबूर है. यही नहीं, कई डॉक्टर को तो विदेशों में जाकर चपरासी की नौकरी करते हुए देखा गया है. वहीं बारहवीं पास नौजवानों को सलाद काटने और दूध के पैकेट बैंड करने तक का काम करना पड़ रहा है,अगर आप हंस रहे हैं तो कृपया अब संजीदगी लाएं क्योंकि हमारा और आपका सबका यही हाल होने वाला है. अगर आज भी हम इसपर गंभीरता से नही सोचते हैं और सरकार पर दबाव नही डालते हैं तो ओहिर हम अपनी अगली पीढ़ी के लिए कोई सपना नही देख पाएंगे.

स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षक की आवश्यकता होते हुए भी उनकी नियुक्ति नहीं की जा रही है. ऐसा नहीं है कि नौकरियां हैं ही नहीं, सारी कमी है प्लांनिंग मेंऔर सूत्रों से आज ही ये पता चला है की जो शिक्षक नियुक्त हैं उनको भी हटा कर कई स्कूलों को  निजी कंपनियों को सौंपने की तैयारी हो रही है.

युवकों की जान देने की बातें भी अब सरकारों के पत्थर समान दिल को पिघला नहीं पाती हैं. कुछ और परेशानियां भी हैं, जैसे कि रट्टू तोते की तरह हमारे स्कूलों में पढ़ना सिखा दिया जाता है, लेकिन किसी स्किल की कमी के कारण भी बहुत लोगों को नौकरियां नहीं मिल पाती हैं. अर्थात एक्सट्रा करिकुलम एक्टिविटी को भी गंभीरता से लेने की ज़रूरत है और नौजवानों में आत्मविश्वास बढ़ाने की भी ज़रूरत है ताकि वो इस कम्पटीशन की दुनिया मे अपना पैर जमा सकें.

शिक्षकों की अधिक नियुक्ती भी होनी चाहिए ताकि और लोग आगे बढ़ सके और कुछ बेरोज़गारी तो दूर हो सके.

हालांकि अभी देखना ये है कि राष्ट्रीय शिक्षा दिवस के दिन हमारी तत्कालीन विकास की बातें करने वाली सरकार कौन सा नया झूठा  वादा करती है, सपना दिखाती है यानी क्या ढोंग करती है क्योंकि नाज़ तो यही आ रहा है कि सपनो को व्यापार बनाकर राजनीति में इस्तेमाल करना इन्हें बखूबी आता है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here