Aashi Saifi for YuvaAdda

“हर किसी को ज़िन्दगी में एक बार हॉस्टल लाइफ़ ज़रूर जीनी चाहिए.”

ये किसी महापुरुष ने नहीं, बल्कि हॉस्टल से निकलने वाली एक छात्रा ने कहा है जो घर से दूर है. 

लड़कियों के लिए हॉस्टल महज़ एक रहने का ठिकाना ही नहीं, बल्कि उनका एक नायाब आशियाना बन जाता है. घर से दूर जब छात्र पढ़ने आते हैं तो घर वालों के मन में कई चीज़ें चलती हैं,  ख़ासकर लड़कियों के लिए. लड़कियों के लिए उनके माता-पिता सबसे पहली चीज़ उनकी सुरक्षा देखते हैं.

जामिया हॉस्टल अपनी इस ज़िम्मेदारी को बखूबी निभाता है. जामिया हॉस्टल में कई छात्राएं दाख़िले के लिए आवेदन डालती हैं, जिनमें से कुछ को हॉस्टल मिलता है एवं कुछ को नहीं भी मिल पाता. जामिया की ही लड़कियां अपने ही हॉस्टल की सुविधा नहीं ले पाती. उन्हें बाहर जाकर पीजी में रहना पड़ता है. और काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है.

हॉस्टल एक ऐसी दुनिया है, जहां खुशी और ग़म दोनों मिलते हैं और इनके साथ हम ज़िन्दगी जीना सीखते हैं.

हॉस्टल की यारी-दोस्ती एक ऐसी चीज़ है, जो आपको हर हाल में खुश रहना सिखा देती है. इस दोस्ती को आप ता-उम्र याद रखते हैं. आपके साथ रहने वाले ही आपके सबसे क़रीबी हो जाते है. रात में घर की याद जब आती है तो आपके रूम पार्टनर ही आपके आंसू पोंछते हैं, आपका सुख दुख बांटते हैं.

कई बार तो नज़ारा देखने लायक़ होता है. जब किसी एक को चुप कराने में दूसरे के जज़्बात सामने आते हैं और वह भी रोने लगते हैं. लेकिन सब यही कोशिश करते हैं कि कैसे भी वो बस चुप हो जाए. दोस्ती-यारी तो यहां ऐसे निभाई जाती है जैसे दो दोस्त एक दुसरे को जन्मों से जानते हों. या यूँ कह लीजिये “सिस्टर फ्रॉम अनादर मदर”.

घर में उठने और सोने के लिए नियम क़ानून होते हैं. जिसे सबसे पहले छात्राएं हॉस्टल में आकर तोड़ती हैं. यहां दिन शुरू होता है रात में और रात होती है दिन में. अब सवाल ये है कि रात में होता क्या है? तो जवाब में हॉस्टल में रहने वाली छात्रा यही कहेगी कि गाने गाना, मूवी देखना और खूब सारी मस्ती…

यही नहीं, 10 बजे खाना खा लेने के बाद दोबारा रात में 2 बजे उठकर कुछ चुटुर-पुटर खाना आम बात होती है. कपड़े धोने का काम हॉस्टल में आमतौर पर रात में ही होता है. इसमे भी एक अलग ही मज़ा है.

हॉस्टल एक घर ही नहीं, बल्कि हम युवाओं का एक ऐसा अड्डा है, जहां आपको पूरे भारत की एक झलक देखने को मिल जाती है. यहां कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक, शायद क़िस्मत से कोई भी आपका रूममेट हो सकता है.

अगर आप ‘इडली सांभर’ नहीं खातीं तो आप यह निश्चित मान लें कि साल के आख़िर तक आपको यह व्यंजन खाना सीखा दिया जाएगा. अगर आप अंतर्मुखी हैं तो आप निश्चिन्त ही एक साल में बहिर्मुखी हो जाएंगे. लोगों से घुल मिल कर रहना किसे कहते हैं, ये आपको यहीं पता चल जाएगा, संक्षेप में कहूँ तो गंगा जमुनी तहज़ीब की झलक आपको ज़रूर देखने को मिलेगी.

यहां अगर कोई सबसे ज्यादा आंखों को अखरती है तो वो होती है हॉस्टल की वॉर्डन. वो एक ऐसी सदस्य होती है जिसके अंदर हिटलर की आत्मा बसी होती है. जिसके आस-पास के गुज़रने की ख़बर भी दिल मे दहशत भर देती है.

बात की शुरुआत और अंत सिर्फ़ क़ायदे-क़ानून के इर्द-गिर्द ही घूमती है. शुरू-शुरू में आपको वॉर्डन बिल्कुल भी नहीं भाती, लेकिन समय बीतने के साथ आप उसकी आदी हो जाती है. और आप उसकी तकलीफ़ों को भी समझने लगते हैं और ये भी समझ आने लगता है कि उसकी सख्ती में भी उसका फ़र्ज़ छुपा है. यही नहीं, एक वक़्त के बाद वॉर्डन की आवाज़ में भी आपके प्रति  थोड़ी सी नरमी आने लगती है.

हॉस्टल एक बहुत ही खूबसूरत दुनिया है, जहां हमें अच्छे बुरे हर तरीक़े का अनुभव मिलता है. अच्छे बुरे लोग मिलते हैं. अच्छा बुरा हर तरीक़े का भोजन मिलता है. विषम परिस्थितियों में खुद को ढ़ालने की सीख मिलती है और सबसे ज्यादा आपको समूचे हिन्दुस्तान के दोस्त मिलते हैं, जो कभी भी कहीं भी आपकी सहायता के लिए हमेशा हाज़िर होंगे. इस खूबसूरत सी दुनिया से दूर जाने का विचार मन मे उदासी भी ले आता है आख़िर इतना प्यार और आज़ादी कहां मिलेगी.

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