नई दिल्ली : बीते रविवार को जेएनयू छात्र समूह “अदबी पंचायत” द्वारा एक सफल साहित्यिक गोष्ठी “महफ़िल-ए-हाज़िर-जनाब” का आयोजन हुआ.

वक्ताओं के रूप में विभिन्न विश्वविद्यालयों से आए युवा ग़ज़लकार, कवि एवं कहानीकार उपस्थित रहे.

स्वागत भाषण में अदबी पंचायत के संयोजक अबुबक्र अय्यूब ने पंचायत के मुख्य उद्देश्य —सभी जाति, धर्म, भाषा आदि से ऊपर उठकर युवा प्रतिभा को प्रोत्साहित करने एवं युवा कलाकारों को एक सफल मंच उपलब्ध कराने के प्रयास की बात सबके समक्ष रखी.

पंचायत के सह संयोजक शम्स वदूद ने पंचायत के इस कार्यक्रम “महफ़िल-ए-हाज़िर जनाब” को जेएनयू में उठ रहे अनिवार्य उपस्थिति दर्ज करने के मुद्दे से जोड़कर देखने की बात की. हालांकि कार्यक्रम में और भी कई मुद्दों पर बात की गई.

कार्यक्रम की शुरुआत परंपरा अनुसार मुख्य अतिथि आलोक यादव (पीसीएस अधिकारी, प्रोविडेंट फंड कमिश्नर, नई दिल्ली) द्वारा दीप प्रज्वल्लन (चिराग रौशन) करने के पश्चात हुई.

कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था. पहले सत्र में नाज़ फ़रहा के संपादन में लैब अकेडेमिया इलाहाबाद से प्रकाशित किताब “मेरी कहानी” का लोकार्पण हुआ. तत्पश्चात अष्टम नीलकंठ एवं सौम्या बैजल ने काव्य पाठ तथा निधि श्री ने कहानी पाठ किया.

सौम्या बैजल की कविता “आवाज़ें” सत्ता द्वारा किए गए दमन और क्रांति की बात करती है. ये वो आवाज़ें हैं जो दायरों को तोड़कर बाहर निकलती हैं, अपने हक़ की बात करती हैं, जो आज़ादी की मांग करती हैं और पितृसत्ता की बेड़ियों को तोड़ देती हैं.

निधि श्री की कहानी “भूख” समाज में स्त्री की विवशता एवं दयनीय स्थिति तथा गरीबी के प्रश्न को हमारे सामने एक मार्मिक ढंग प्रस्तुत करती है.

दूसरा सत्र दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्रा निधि सिंह के काव्य पाठ से प्रारम्भ हुआ. इस सत्र में मिस्बाह फ़ातिमा, मोहम्मद शमीम अख्तर, असरारुल हक़ जिलानी, सायमा समरीन, अखिलेश यादव एवं महफ़िल के मुख्य अतिथि आलोक यादव ने शेर एवं नज़्म पढ़ीं.

निधि की कविता “घर” एक स्त्री की इच्छाओं के घर की बात करती है, जहाँ वह उन्मुक्त हो, स्वच्छंद हो. जिसकी तलाश उसे हर वक़्त रहती है. वहीं उनकी दूसरी कविता “ज़ाहिद” ग्रामीण परिवेश की सैर कराते हुए उन तमाम वंचित बच्चों की ओर संकेत करती है, जिनसे उनका बचपन समय से पहले ही छीन लिया जाता है.

मिस्बाह फ़ातिमा की नज़्म “सॉरी” युवा मन की मधुर अभिव्यक्ति के रूप में हमारे सामने आती है. ये वो सॉरी है, जो बड़ी सरल है, पर कभी कभी बड़ी कठिन और भारी भी जान पड़ती है.

मोहम्मद शमीम की पहली नज़्म जहां क्रांति की बात करती है, वहीं उनकी दूसरी नज़्म में वे उन तमाम बेरोज़गारों की मनःस्थिति बता देते हैं जो अपने अपने घरों से दूर पढ़-लिख कर किसी रोज़गार की तलाश में लगे हुए हैं. उन सभी के अम्मी अब्बू और उन सभी के घरों के हालात लगभग वैसे ही हो जाते हैं जैसा कि शायर अपनी नज़्म में कहता है.

सायमा ने अपने शेरों में अनिवार्य हाज़िरी और नजीब की बात को उठाया साथ ही मोहब्बत के हवाले से कुछ और शेर भी पढ़े.

अखिलेश ने अपने शेरों में ज़िन्दगी का ज़िक्र किया है, जिसे वे एक अनबूझी पहेली और कुछ नाज़ुक सवालों की लड़ी के रूप में देखते हैं.

आलोक यादव की शायरी में मुहब्बत के मीठापन के साथ ही बेवफ़ाई की टीस और जुदाई का दर्द है और साथ ही साथ राजनीतिक चेतना के बिम्बों की उपस्थिति भी.

असरार की नज़्मों में इंसान की क़ीमत, गुलामी, चीखों, सिसकियों और पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए विद्रोह की बात की गई है. असरार की कहानी “देखते देखते” में दूरदर्शिता परिलक्षित होती है, जिसमें वे आज से कुछ वर्षों के पश्चात विश्वविद्यालय की संभावित परिस्थितियों का जायज़ा लेते हैं.

मेहरान ने कुछ शेर मोहब्बत के वास्ते कहे और फ़ैज़ की मशहूर नज़्म “गुलों में रंग भरे बाद नौ बहार चले” और अहमद फ़राज़ की नज़्म “रंजिशें ही सही” को तरन्नुम के साथ प्रस्तुत किया.

कार्यक्रम का संचालन इरम सबा और शम्स वदूद द्वारा किया गया तथा धन्यवाद ज्ञापन डॉ समन अहमद ने किया. इस मौक़े पर विश्वविद्यालय के विद्यार्थी भारी संख्या में उपस्थित रहे.

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