F Hussain, YuvaAdda.com

मैं रोज़ थोड़ा थोड़ा सीखती हूं. दफ़्तर का काम हो, मेरे दोस्तों, फैमिली या हमसफ़र से मेरा जुड़ाव हो या अपना हक़ मांगना हो. हर चीज़ में मैं रोज़-रोज़ थोड़ा-थोड़ा सीखती हूं. मुझे हर दिन का तजुर्बा बताता है कि उम्र के साथ ज़रुरतें बदल जाती हैं. टीन-एज में या सच कहूं तो 21-22 साल तक की उम्र में मैं सोचती थी कि जो मुझे करना है कर के रहूंगी, कोई साथ दे या ना दे और मैंने किया भी. जो किया उसे पढ़कर आपको हंसी आएगी. बहुत ही मामूली सा काम था.

मैंने कॉलेज के दौरान थिएटर किया, जो कि कोई अलग या अनोखा काम नहीं था, सभी करते हैं. लेकिन जिस माहौल में मैं पली-बढ़ी थी उसके मुताबिक़ मेरे लिए थिएटर करना अनोखा था.  थिएटर के लिए मैंने फैमिली से झूठ बोला. मेरी ज़िन्दगी का पहला झूठ और शायद आख़िरी.

‘शौक़ है’ एक्टिंग का… हां! आज भी है और तब भी था और फैमिली से कहा कि एमए करना है थिएटर में, इसलिए थिएटर की ही थ्योरी की कोचिंग क्लास ले रही हूं. इसके बावजूद भी बहुत दिक्कते हुई. चाहती तो साफ़ बता भी सकती थी कि स्टेज पर नाटक करती हूं. पर सोचा अगर मेरे पेरेंट्स को मैं नाचती-गाती अच्छी ना लगी तो… वो तो एक झटके में बंद करवा देंगे, इसलिए कभी नहीं बताया.

जब थिएटर करना शुरू किया 21 साल की थी और जब ‘श्री राम कॉलेज ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स’ से पास-आउट हुई तो 24 की हो गई थी. शो ख़त्म होने के बाद ऑडियंस की तालियों की गूंज में जो खुशी मिलती है, उसे बयां नहीं कर सकती. क्योंकि वो लिखने के लिए नहीं है जीने के लिए है.

उसके अगले ही पल में स्टेज से रोशनी कम होती है और हॉल में लाइट्स जलती है तब ऑडियंस के चेहरे दिखने शुरू होते हैं. उस भीड़ में मैं सिर्फ़ अपनी फैमिली को खोजती थी.

दोस्त हर ज़रूरत पूरी नहीं कर सकते. अगर फैमिली के खालीपन को टीचर्स, दोस्तों या उनके पेरेंट्स की मौजूदगी से भर रहे होते हैं तो भी हम खुद से झूठ बोल रहे होते हैं कि हमें फैमिली की ज़रूरत नहीं है. ये मुझे अब समझ आया है.

उस वक़्त मैंने सीखा, अपनो से लड़कर मनमर्जी का काम कर तो लो लेकिन कामयाबी के मंच से जब उतरते हैं तो सिर्फ़ अपने ही चाहिए होते हैं. वो अपने जो हमें मिली ट्रॉफी और अवॉर्ड्स को संभाल के घर की उस अलमारी में रखते हैं. जहां घर में आने वाले हर शख्स की नज़र सबसे पहले जाती है.

पर आज भी मैं यही कहना चाहती हूं अपने मन का करने के लिए लड़ना ज़रूर चाहिए. उसके बाद आप खुद के लिए जवाबदेह होते हैं. जैसे मैं हूं.

आख़िर मैं बस ये कहना चाहती हूं कि जो आप चाहते हों वो अब तक नहीं मिला तो मेहनत कीजिए, कामयाब बनिए खुद वो जहां बनाइए और अपनी औलाद को वो सब या उससे भी ज्यादा देना जो आपको चाहिए था. वही आपकी जीत होगी. कभी ऐसे ना बनना कि उन्हें भी भीड़ में अपने पेरेंट्स का चेहरा ढूंढना पड़े…

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