Isha Fatima, YuvaAdda.com

ज़िंदगी का सबसे बड़ा सबक़ ख़ुद ज़िंदगी ही सिखाती है. तमाम कामयाबियों में से एक अपने रिश्ते मज़बूत होना होता है, जिसका अहसास मुझे अब हुआ है. एक वक्त था जब तुम्हारा और मेरा ख्वाब ‘हम’ होना था. हमें कुछ कहने की ज़रुरत ना पड़ती थी, नज़रें ही एक-दूजे से सब कह दिया करती थीं. हम दोनों ने ज़िंदगी में सबसे ज्यादा तवज्जो एक-दूसरे को दी. फिर हमारे ख्वाब हक़ीक़त बने, तुम और मैं हम हो गए.

तुम्हे पाकर मैं तो पूरी हो गई… लेकिन पता नहीं क्यों तुम्हें अधूरा सा पाया. क्या इतना काफी नहीं कि मैं तुम्हारे पास तुम्हारे साथ हूं. तुम्हारी नज़रों में मैं खुद को गैरों जैसा देखती हूं तो सोचती हूं, काश! तुम मिले ही न होते, और जब मिल गए हो तो डर कैसा ?

हमारे पांच साल के रिश्ते की नींव पांच महीने में यूं हिल जाएगी, ये मैंने कभी ख़्वाबो में भी ना सोचा था. क्या तुमने कभी सोचा था हम दोनो के अलग होने का मंज़र ?

ये गुस्सा ये अकड़ हमें ले डूबेगी… और तैरना हम दोनों को ही नहीं आता. नफरत हम दोनों को बहुत दूर ले जा रही है, रास्तों के साथ मंज़िलें अलग सी हो गई हैं, ना तुम रुक पाओगे ना मैं मुड़ पाऊंगीं. दिल कहता है रोक लू तुम्हें… पर तुम भी तो मुझे रोको ना…

अजब सी कश-म-कश है लगता है मैं सब्र करूं तो वक्त निकल जाएगा और वक्त निकल गया तो फल कहीं खो जाएगा. वो वक्त आएगा जब हमारी आंखों में आंसूं होंगे और हम एक-दूजे के लिए अजनबी. आज मेरा इम्तिहान है कल तुम्हारा होगा . सोच लो, रोक लो, शायद वो मोड़ कभी न आए जहां तुम और मैं फिर हम हों. चलो चंद लम्हों की खुशी दे दें , कुछ नहीं कर सकते तो आज़ादी दे दें…

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