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Isha Fatima, YuvaAdda.com

रोज़ की तरह घर से निकली ही थी कि एक अंकल से मुलाक़ात हुई. बात करने से पता चला कि उनकी उम्र लगभग 45 साल है, पहनावे से ठीक-ठाक मगर 55 से ज्यादा के लग रहे थे. मुझसे पूछा, आपको किसी बर्तन या सफाई वाले की ज़रुरत हो तो मुझे बताइएगा, मैं यहीं पास में रहता हूं.

मुझे काम वाली की ज़रुरत थी, इसलिए मैंने 2 घंटे बाद आने के लिए कह दिया. घर पहुंची तो वो अंकल को घर के बाहर बैठे थे. अंकल मुझे देख खुश हो गए और झट से बोले, बेटा बर्तन धोने हैं या कपड़े ? मैं चौंक गई. मुझे लगा था काम करने के लिए कोई लड़की या आंटी आएंगी. खैर… मझे ऐसा क्यों लगा ये अलग मसला है. इसे समझाने बैठी तो यहां के मुद्दे से भटक जाऊंगी.

मैंने पूछा, कितने बच्चे हैं आपके? क्या करते है? उन्होने बताया, दो बेटियां हैं, एक पांचवी और दूसरी सातवीं में पढ़ती है, एक बेटा है जो फिज़िकली चैलेंज्ड है, जिसकी कंडिशन की वजह से कोई स्कूल उसे एडमीशन नहीं देता. बीवी पिछले 8 सालों से बेड पर है वो चल फिर नहीं सकतीं. एम्स में 3-4 साल से इलाज चल रहा है. जहां कभी तारीख़ नहीं मिलती तो कभी पैसे की डिमांड उनके इलाज में रुकावट बन जाती है.

घर-घर जाकर बर्तन, कपड़े धोता हूं. 25 से 50 रुपए और साथ में बचा-खुचा खाना भी मिल जाता है जिससे हमारा गुज़ारा चलता है. बीवी का इलाज कराना है जिसके लिए न तो पैसे हैं और न कोई रोज़गार. कहां से उन्हें खिलाऊं, किस तरह पढ़ाऊं और कैसे इलाज हो? कोई सहारा कोई उम्मीद नज़र नहीं आती. दिल्ली जैसे शहर में ये हाल है तो दूर दराज़ के गांवों का क्या हाल होगा?

डिजिटल- कैशलेस इंडिया ज्यादा ज़रुरी है या फिर बेसिक चीज़ें? बेरोज़गारी की मार में सबसे ज्यादा पिसता ग़रीब ही है. गरीबों को बेसिक सहुलियत मुहय्या कराए बगैर सरकार डिजिटल, कैशलेस और बुलेट ट्रेन का सपना देख रही है, तो ये देश कभी पनप नहीं पाएगा.

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