Sadaf Khan for YuvaAdda.com

दिल्ली से महज़ 45 किलोमीटर दूर ग्रेटर नोएडा का एक गांव आज भी सामाजिक पिछड़ेपन का शिकार है. यहां आकर मुझे ऐसा महसूस होता है कि जैसे मैं किसी ऐसे दुनिया में आ गई हूं, जहां पर आज भी इस 21वीं सदी में भी लड़कियों के पास कोई अधिकार नहीं है. आज भी वो अपने मां-बाप की गुलाम हैं.

हमारे देश को आज़ाद हुए 70 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी लड़कियां अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं. हालांकि गांव में तो लड़कियां बोल भी नहीं पाती हैं.

ऐसी ही कहानी ग्रेटर नोएडा के इस गांव की भी है. हमेशा से यहां आकर मुझे घुटन सी होती है. यहां आकर ऐसा महसूस होता है कि मैं 20 साल पीछे चली गई हूं. यहां पर लड़कियों पर बोलने पर भी पाबंदी है.

हद तो ये है कि इनके जीवनसाथी का चुनाव बग़ैर पूछे बिना इनकी मर्ज़ी के रिश्तेदारों द्वारा कर लिया जाता है और लड़की चूं तक नहीं कर पाती है. समझ यह नहीं आता उस जीवनसाथी के साथ रिश्तेदारों को रहना होता या फिर लड़कियों को?

कुछ केसों में लड़की द्वारा सवाल पूछे जाने पर इस्लाम की दुहाई देकर उन्हें चुप करा दिया जाता है. धर्म की आड़ में अपनी मनमानी की जाती है. और जिससे मन करता है उसके साथ उसका पल्लू बाँधकर खुद को अपने फ़र्ज़ से आज़ाद कर लिया जाता है. कोई इनको बताता क्यूं नहीं कि इस्लाम में पसन्द और मर्ज़ी की इजाज़त दी गई है. तो फिर क्यूं लड़की पर इतना ज़ुल्म किया जाता है?

आज मैं ये देखकर काफी हैरान हो गई कि मेरे मोहल्ले की एक सादा सी बेहद हुनरमंद लड़की की शादी की गई और उसको शादी से पहले उसके जीवनसाथी को दिखाया भी नहीं गया. उसके बारे में कुछ बताया भी नहीं गया. बस एक चीज़ की तरह सजा-संवार कर किसी और के हवाले करके अपने सर से बोझ उतार दिया गया.

बेटी की शादी करने के नाम पर उनको घर से इस तरह रफ़ा-दफ़ा किया जाता है, जैसे उसका घर हो ही ना. समझ नहीं आता कि वो सजने-संवरने वाली लड़की के पास क्या दिल नहीं होता क्या? कोई एहसास नहीं होते क्या? वो लड़की इंसान नहीं होती?

नहीं! उस लड़की के भी अपने कुछ अधिकार हैं. अपने जीवन को अपनी तरह से व्यतीत करने का हक़ है. शर्म आती है मुझे अपने देश के इस पुरुष प्रधान समाज पर जो अपनी समाज की दिखावे की इज़्ज़त के कारण अपनी बेटी को किसी के भी हवाले करके आ जाते है. धुत्कार है ऐसे मां-बाप पर जो बेटियों को अपनी जागीर समझ कर जैसे मन में आता है वैसा सुलूक करते हैं.

इसके साथ ही साथ मेरे गांव में एक और रिवाज है. वो है –बेटियों के पैदा होने पर ग़म मनाने का रिवाज. अगर बेटा हुआ तो पटाखे फूटेंगे, लड्डू बटेंगे, दावते होंगी. उस बेटे पर ना जाने दादा-दादी तो क्या-क्या न्योछावर करने को तैयार रहेंगे. लेकिन जैसे ही बेटी की ख़बर गांव में दाई मां आकर दादा-दादी को सुनाती है, उनके चेहरे का रंग फीका पड़ जाता है. हद तो तब हो जाती है जब उस नवजात बच्ची यानी अपनी पोती को दादा-दादी द्वारा गोद तक में खिलाया भी नहीं जाता है. उसका बेटी का पिता मुंह फेर कर खड़ा हो जाता है.

इस्लाम में कहा गया है कि खुदा जब खुश होता है तो आपके घर में बेटियां देता है. आपको बेटियों से नवाज़ता है, तो फिर यह लोग जो बेटी की शादियों पर इस्लाम की दुहाइयां देते फिरते हैं, बेटी के जन्म पर यह दुहाइयां कहां चली जाती हैं. इन सब में उस नवजात बच्ची को देखकर मेरी आँखें नम हो जाती हैं. मैं शर्मसार हो जाती हूं, यह देखकर ऐसे जगहों पर एक औरत ज़ात ही एक बेटी जात की दुश्मन बन जाती है.

(सदफ़ खान जामिया मिल्लिया इस्लामिया में मास मीडिया की छात्रा हैं.)

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