कभी बेटियों से भी तो पूछो, वो क्या चाहती हैं

तितलियों सी नाज़ुक, वो तो बस उड़ना चाहती हैं

ख्वाहिशें उनकी भी तो जानो कभी ज़रा

शायद माँ से लिपट के रोना चाहती हैं

हौसलों को मात दे देती हैं समाज की निगाहें

वरना बेटियां भी उम्मीद के बीज बोना चाहती हैं

ये तमाशे भला कब तक दिखाओगे तुम

थक हार गयी हैं वो, अब सोना चाहती हैं

इनकी आँखें तो पढ़ो, कितना रोती हैं आजकल

अभी से नहीं वो, विदा होना चाहती हैं

है ये मुमकिन के दिल हो उनके भी सीने में

साहिल तक पहुंच कर खुश होना चाहती हैं

कभी बेटियों से भी तो पूछो, वो क्या चाहती हैं

तितलियों सी नाज़ुक, वो तो बस उड़ना चाहती हैं

Afshan Khan, YuvaAdda.com

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